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₹510 करोड़ विवाद में बड़ा फैसला: बॉम्बे हाईकोर्ट ने मनी-लेंडिंग लाइसेंस पर खारिजी अर्जी ठुकराई

Vivek G.
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अशोक कमर्शियल एंटरप्राइजेज बनाम हबटाउन लिमिटेड, ₹510 करोड़ के विवाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने मनी लेंडिंग लाइसेंस के आधार पर वाद खारिज करने की अर्जी ठुकराई। जानें पूरा फैसला।

₹510 करोड़ विवाद में बड़ा फैसला: बॉम्बे हाईकोर्ट ने मनी-लेंडिंग लाइसेंस पर खारिजी अर्जी ठुकराई

मुंबई की अदालत में बुधवार का दिन असामान्य रूप से शांत था, लेकिन मामला बेहद भारी-भरकम। लगभग ₹510 करोड़ की रकम, 36% तक ब्याज और बाउंस हुए चेक - इन सबके बीच एक अहम सवाल खड़ा हुआ: क्या बिना मनी-लेंडिंग लाइसेंस के दायर किया गया यह मुकदमा शुरू में ही खारिज कर दिया जाए?

बॉम्बे हाईकोर्ट की एकल पीठ, न्यायमूर्ति गौरी गोडसे ने इस सवाल पर विस्तृत सुनवाई के बाद फैसला सुनाया।

मामला क्या है?

यह विवाद Ashok Commercial Enterprises बनाम Hubtown Limited के बीच का है।

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Hubtown Limited पर आरोप है कि उसने वर्षों पहले लिए गए भारी-भरकम ‘बिज़नेस लोन’ का भुगतान नहीं किया। दूसरी ओर, Ashok Commercial Enterprises का कहना है कि 2011-12 से शुरू हुए लेन-देन में पहले ₹48 करोड़ और बाद में यह रकम बढ़ते-बढ़ते लगभग ₹510 करोड़ तक पहुंच गई।

वादी पक्ष के मुताबिक, इस राशि के बदले प्रतिवादी ने पोस्ट-डेटेड चेक और डिमांड प्रॉमिसरी नोट जारी किए। लेकिन जब चेक बैंक में लगाए गए तो वे “insufficient funds” के कारण बाउंस हो गए। इसके बाद सिविल सूट के साथ-साथ आपराधिक शिकायत भी दायर की गई।

प्रतिवादी की दलील: लाइसेंस नहीं, तो मुकदमा भी नहीं

प्रतिवादी कंपनी की ओर से वरिष्ठ वकीलों ने दलील दी कि वादी असल में ‘मनी लेंडिंग’ का कारोबार कर रहा है।

उन्होंने कहा, “वादी ने खुद स्वीकार किया है कि वह बिल्डर फाइनेंस का काम करता है और 36% तक ब्याज वसूलता है। यह स्पष्ट रूप से मनी लेंडिंग है।”

महाराष्ट्र मनी लेंडिंग (रेगुलेशन) अधिनियम, 2014 की धारा 13 का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि बिना वैध लाइसेंस के कोई भी व्यक्ति ऋण वसूली का डिक्री नहीं ले सकता। इसलिए, सिविल प्रक्रिया संहिता की Order VII Rule 11(d) के तहत वाद पत्र (plaint) को प्रारंभिक चरण में ही खारिज किया जाना चाहिए।

प्रतिवादी ने यह भी कहा कि “चतुर ड्राफ्टिंग” के जरिए वादी ने लाइसेंस न होने की बात छिपाई है।

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वादी की प्रतिक्रिया: यह ‘लोन’ नहीं, अपवाद में आने वाला एडवांस

वादी पक्ष ने जोर देकर कहा कि मामला मनी लेंडिंग कानून के दायरे में नहीं आता।

उनका कहना था कि यह रकम ‘नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट’ यानी चेक और प्रॉमिसरी नोट के आधार पर दी गई थी, जो कानून की परिभाषा में ‘लोन’ नहीं बल्कि एक अपवाद (exception) में आती है।

वादी के वकील ने अदालत में कहा, “केवल पैसे देना किसी को मनी लेंडर नहीं बना देता। जब तक यह साबित न हो कि व्यक्ति व्यवस्थित और नियमित रूप से लाइसेंस लेकर मनी लेंडिंग कर रहा है, धारा 13 लागू नहीं होती।”

अदालत की टिप्पणी

न्यायमूर्ति गोडसे ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि Order VII Rule 11 के तहत वाद पत्र को खारिज करना एक “कठोर कदम” है।

अदालत ने कहा, “जब तक यह साफ-साफ न दिखे कि मुकदमा कानूनन प्रतिबंधित है, उसे प्रारंभिक स्तर पर समाप्त नहीं किया जा सकता।”

पीठ ने यह भी दोहराया कि:

“केवल पैसे उधार देना किसी पक्ष को स्वतः मनी लेंडर नहीं बना देता। यह तथ्य कि वह कानून की परिभाषा में आता है या नहीं, साक्ष्य के आधार पर तय होगा।”

अदालत ने माना कि यह तय करने के लिए कि वादी वास्तव में ‘मनी लेंडिंग बिज़नेस’ में है या नहीं, विस्तृत साक्ष्य की आवश्यकता होगी। यह मुद्दा ट्रायल में ही स्पष्ट हो सकता है।

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अंतिम निर्णय

अदालत ने पाया कि वाद पत्र को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वादी के पास मनी लेंडिंग लाइसेंस नहीं है।

धारा 13 का प्रतिबंध लागू होता है या नहीं - यह एक ऐसा प्रश्न है जिसे सबूतों के आधार पर परखा जाना चाहिए।

इसलिए, प्रतिवादी द्वारा दायर की गई अंतरिम आवेदन (Interim Application) को खारिज कर दिया गया। मुकदमा अब नियमित सुनवाई के लिए आगे बढ़ेगा।

Case Title: Ashok Commercial Enterprises vs Hubtown Limited

Case No.: Interim Application (L) No. 27175 of 2021 in Commercial Suit No. 1532 of 2018

Decision Date: 21 January 2026

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