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फर्जी LLB डिग्री कांड में बड़ा फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी वकील की जमानत रद्द की

Vivek G.
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ज़ेबा खान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य, सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी एलएलबी डिग्री और धोखाधड़ी मामले में आरोपी मजहर खान की जमानत रद्द की, हाईकोर्ट के आदेश को बताया त्रुटिपूर्ण।

फर्जी LLB डिग्री कांड में बड़ा फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी वकील की जमानत रद्द की

सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी एलएलबी डिग्री मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी मजहर खान की जमानत रद्द कर दी। कोर्ट ने साफ कहा कि हाईकोर्ट ने जमानत देते समय महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज किया और आरोपी के आपराधिक इतिहास पर ध्यान नहीं दिया।

यह फैसला R. Mahadevan की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनाया, जिसमें जमानत आदेश को “कानूनी रूप से अस्थिर” बताया गया।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला FIR संख्या 314/2024 से जुड़ा है, जो उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में दर्ज हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि एक संगठित गिरोह फर्जी कानून की डिग्रियां और अंकतालिकाएं तैयार कर उन्हें बेच रहा है।

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आरोप है कि मजहर खान ने खुद को एलएलबी, एलएलएम और पीएचडी धारक बताकर वकील के रूप में पेश किया। जांच के दौरान Veer Bahadur Singh Purvanchal University ने स्पष्ट पत्र जारी कर बताया कि संबंधित संस्थान उनकी संबद्ध सूची में नहीं है और कथित अंकतालिका विश्वविद्यालय द्वारा जारी नहीं की गई।

इसके अलावा, Bar Council of India ने भी बाद में उनका नाम अधिवक्ताओं की सूची से हटा दिया और उन्हें वकालत से डिबार कर दिया।

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हाईकोर्ट का आदेश और विवाद

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 जुलाई 2025 को मजहर खान को जमानत दे दी थी। अदालत ने माना कि मामला पारिवारिक विवाद से जुड़ा हो सकता है और आरोपों की जांच पूरी हो चुकी है।

लेकिन शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर कहा कि आरोपी ने अपने खिलाफ दर्ज कई अन्य एफआईआर छिपाई थीं। रिकॉर्ड के अनुसार, उनके खिलाफ विभिन्न राज्यों में नौ आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें धोखाधड़ी, जालसाजी और धमकी जैसे आरोप शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि जमानत कोई “स्वचालित अधिकार” नहीं है। अदालत ने टिप्पणी की,

“जब जमानत आदेश प्रासंगिक तथ्यों की अनदेखी पर आधारित हो, तो उच्चतर अदालत का हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है।”

कोर्ट ने पाया कि आरोपी ने अपने आपराधिक इतिहास का पूरा खुलासा नहीं किया। यह भी सामने आया कि जिस मार्कशीट का हवाला दिया गया, उस पर स्पष्ट रूप से लिखा था कि उसे मूल प्रमाणपत्र नहीं माना जा सकता।

पीठ ने कहा,

“आरोप केवल एक डिग्री तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह न्याय व्यवस्था और कानूनी पेशे की साख से जुड़ा गंभीर मामला है।”

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सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि यदि कोई व्यक्ति फर्जी डिग्री के आधार पर अदालतों में पेश होता है, तो इससे आम जनता का भरोसा कमजोर होता है।

अपीलकर्ता ने जांच को किसी विशेष एजेंसी को सौंपने की मांग की थी। लेकिन कोर्ट ने कहा कि चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और मजिस्ट्रेट ने संज्ञान भी ले लिया है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक जांच में पक्षपात या दुर्भावना का ठोस प्रमाण न हो, तब तक विशेष एजेंसी को मामला सौंपने का कोई आधार नहीं बनता।

अदालत का अंतिम निर्णय

सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा दिया गया जमानत आदेश “कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है” और इसे रद्द किया जाना चाहिए।

अदालत ने आदेश दिया कि मजहर खान की जमानत रद्द की जाती है।

Case Title: Zeba Khan vs State of U.P. & Others

Case No.: Criminal Appeal No. 825 of 2026

Decision Date: 2026

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