Logo

POCSO मामलों में जमानत पर बड़ा फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की सीमा रेखा खींची, उम्र जांच पर अहम टिप्पणी

Vivek G.
Add Court Book as a preferred source on Google

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनुरुद्ध एवं अन्य। POCSO मामलों में जमानत पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, हाईकोर्ट की सीमा तय, उम्र जांच और CrPC धारा 439 पर अहम टिप्पणी।

POCSO मामलों में जमानत पर बड़ा फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की सीमा रेखा खींची, उम्र जांच पर अहम टिप्पणी

नई दिल्ली की अदालत में माहौल गंभीर था। Supreme Court of India की पीठ ने एक ऐसे सवाल पर सुनवाई की, जो सीधे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जांच प्रक्रिया से जुड़ा है। मुद्दा था-क्या जमानत सुनते समय हाईकोर्ट पुलिस को पीड़िता की उम्र की मेडिकल जांच के लिए बाध्य कर सकता है?

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्पष्ट शब्दों में जवाब दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल की गई थी। मामला जालौन जिले के एक POCSO केस से जुड़ा है, जहां आरोपी पर नाबालिग लड़की के अपहरण और यौन उत्पीड़न के आरोप लगे थे।

Read also:-सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: फैक्ट्री परिसर में चलने वाली भारी मशीनें मोटर वाहन नहीं, रोड टैक्स नहीं लगेगा

ट्रायल कोर्ट ने पहले जमानत से इनकार किया। इसके बाद Allahabad High Court में आरोपी ने जमानत मांगी।

Court Book subscription: bare acts, legal drafts, court judgments and ad-free legal news, plans from ₹30/month

हाईकोर्ट ने न सिर्फ आरोपी को जमानत दी, बल्कि पुलिस को निर्देश भी दिए कि POCSO मामलों में जांच की शुरुआत में ही पीड़िता की मेडिकल उम्र जांच कराई जाए और उसी रिपोर्ट को जमानत सुनवाई में आधार बनाया जाए।

हाईकोर्ट के अवलोकन

हाईकोर्ट ने कहा था कि-

“जमानत का अधिकार अब केवल कानूनी नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़ा अधिकार बन चुका है।”

कोर्ट ने यह भी माना कि कई मामलों में स्कूल रिकॉर्ड और बयान में उम्र को लेकर विरोधाभास होता है, जिससे निर्दोष लोग लंबे समय तक जेल में रह जाते हैं।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने मेडिकल उम्र निर्धारण को अधिक विश्वसनीय मानते हुए सामान्य दिशा-निर्देश जारी कर दिए।

Read also:-वैवाहिक तनाव को अपराध नहीं कहा जा सकता: दहेज और क्रूरता केस पर हाईकोर्ट की सख़्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस रुख से असहमति जताई। न्यायमूर्ति संजय करोल की अध्यक्षता वाली पीठ ने साफ कहा—

“धारा 439 CrPC के तहत जमानत सुनते समय हाईकोर्ट का अधिकार केवल यह तय करने तक सीमित है कि आरोपी को जेल में रहना चाहिए या नहीं।”

पीठ ने कहा कि जमानत की सुनवाई को “मिनी ट्रायल” में नहीं बदला जा सकता।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि—

“संवैधानिक अदालत होने का अर्थ यह नहीं कि हर वैधानिक सीमा को लांघा जाए।”

सुप्रीम कोर्ट ने विस्तार से समझाया कि:

• POCSO कानून का मकसद बच्चों की सुरक्षा है

• उम्र निर्धारण की एक तय वैधानिक प्रक्रिया है

• स्कूल प्रमाणपत्र, जन्म प्रमाणपत्र को प्राथमिकता दी गई है

• मेडिकल जांच केवल तब होती है, जब दस्तावेज उपलब्ध न हों

कोर्ट ने कहा कि उम्र तय करना जांच और ट्रायल का विषय है, न कि जमानत चरण का।

Read also:-सिर्फ शक के आधार पर जेल नहीं: ड्रग मामलों में निवारक हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट की रोक

अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा जारी सामान्य दिशा-निर्देशों को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया।

पीठ ने माना कि हाईकोर्ट ने जमानत सुनवाई के दौरान ऐसे निर्देश दिए, जो कानूनन संभव नहीं थे।

हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल अधिकार क्षेत्र और प्रक्रिया से जुड़ा है, न कि आरोपी की दोषसिद्धि या निर्दोषता से।

इसके साथ ही राज्य सरकार की अपील स्वीकार कर ली गई।

Case Title: State of Uttar Pradesh vs Anurudh & Anr.

Case No.: Criminal Appeal @ SLP (Crl.) No. 10656 of 2025

Decision Date: 09 January 2026

Download Judgment

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Get it on Google PlayDownload on the App Store
Join the Court Book WhatsApp channel for latest judgments, notifications, legal news and exam updates