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मदुरै एयरपोर्ट विस्तार पर बड़ा फैसला: पुनर्वास की मांग खारिज, हाईकोर्ट ने बेदखली को दी हरी झंडी

Vivek G.
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पी. मलैराजन एवं अन्य बनाम तमिलनाडु सरकार एवं अन्य, मदुरै हाईकोर्ट ने एयरपोर्ट विस्तार मामले में पुनर्वास की मांग खारिज की, 2009 अधिग्रहण को वैध ठहराया।

मदुरै एयरपोर्ट विस्तार पर बड़ा फैसला: पुनर्वास की मांग खारिज, हाईकोर्ट ने बेदखली को दी हरी झंडी

मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने मदुरै एयरपोर्ट के अंतरराष्ट्रीय विस्तार से जुड़े लंबे विवाद पर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया कि जिन ज़मीनों का अधिग्रहण 2009 में हो चुका था, वहां के निवासियों को पुनर्वास और पुनर्स्थापन (R&R) का अतिरिक्त लाभ नहीं मिल सकता।

न्यायमूर्ति जी. जयचंद्रन और न्यायमूर्ति के. के. रामकृष्णन की पीठ ने यह साझा आदेश 27 फरवरी 2026 को सुनाया।

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मामले की पृष्ठभूमि

चिन्ना उदैप्पु, अय्यनपप्पाकुडी गांव के करीब 350 परिवारों की जमीन मदुरै एयरपोर्ट को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकसित करने के लिए अधिग्रहित की गई थी। अधिग्रहण की प्रक्रिया 2009 में तमिलनाडु के औद्योगिक प्रयोजन अधिनियम के तहत शुरू हुई थी।

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याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे अनुसूचित जाति समुदाय से हैं और बिना उचित पुनर्वास दिए उन्हें बेदखल किया जा रहा है। उन्होंने अदालत से मांग की कि उन्हें घर, वैकल्पिक जमीन और पुनर्वास पैकेज दिया जाए।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले G. Mohan Rao v. State of Tamil Nadu का हवाला देते हुए कहा कि पुनर्वास कानून लागू होना चाहिए।

दूसरी ओर, राज्य सरकार और Airports Authority of India ने बताया कि 90% भूमि का कब्जा पहले ही लिया जा चुका है और मुआवजा भी दिया जा चुका है। केवल कुछ परिवार अब भी जमीन खाली नहीं कर रहे।

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अदालत की प्रमुख टिप्पणियां

पीठ ने स्पष्ट किया कि अधिग्रहण की प्रक्रिया 2009 में पूरी हो चुकी थी, यानी केंद्रीय भूमि अधिग्रहण कानून 2013 लागू होने से पहले।

अदालत ने कहा:

“Section 24 केवल मुआवजे के निर्धारण की बात करता है, यह पुनर्वास और पुनर्स्थापन का अधिकार स्वतः प्रदान नहीं करता।”

न्यायालय ने यह भी माना कि सरकार ने भले ही 2013 के कानून के तहत अतिरिक्त मुआवजा ‘एक्स-ग्रेशिया’ के तौर पर दिया हो, लेकिन इससे याचिकाकर्ताओं को पुनर्वास की कानूनी गारंटी नहीं मिलती।

पीठ ने कहा कि अधिकांश भूमि पर कब्जा लेकर चारदीवारी भी बनाई जा चुकी है। केवल 10% भूमि पर ही विवाद शेष है।

पुनर्वास की मांग पर कोर्ट का रुख

राज्य सरकार ने सुनवाई के दौरान बताया कि विशेष योजना के तहत प्रत्येक परिवार को दो सेंट (करीब 871 वर्गफुट) जमीन और “कलाईग्नरिन कनवु इल्लम” योजना के तहत पक्का मकान देने की पेशकश की गई है।

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने यह साबित नहीं किया कि उनकी आजीविका कृषि पर निर्भर थी या वे कृषि भूमि से बेदखल हो रहे हैं।

पीठ ने टिप्पणी की:

“मुआवजा प्राप्त करने के बाद भी जमीन खाली न करना, न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और अनुचित लाभ उठाने जैसा है।”

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संवैधानिक चुनौती पर फैसला

दूसरी याचिका में याचिकाकर्ताओं ने तमिलनाडु अधिनियम की कुछ धाराओं को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की थी।

अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही पुनर्जीवन अधिनियम 2019 को वैध ठहरा चुका है। इसलिए इन धाराओं को रद्द करने का कोई आधार नहीं है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि 2017 के नियम पहले से लागू हैं और नए नियम बनाने की आवश्यकता नहीं थी।

अंतिम निर्णय

अदालत ने दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं।

पीठ ने कहा कि चूंकि अधिग्रहण की प्रक्रिया वैध रूप से पूरी हो चुकी है और मुआवजा दिया जा चुका है, इसलिए प्रशासन को कानून के तहत कब्जा लेने और आवश्यकता पड़ने पर बल प्रयोग करने का अधिकार है।

इस तरह मदुरै एयरपोर्ट के अंतरराष्ट्रीय विस्तार की राह में अटकी अंतिम कानूनी बाधा भी हट गई।

Case Title: P. Malairajan & Ors. vs Government of Tamil Nadu & Ors.

Case No.: W.P.(MD) Nos. 27922, 29208 & 28131 of 2024

Decision Date: 27.02.2026

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