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मालेगांव ब्लास्ट मामला: बॉम्बे हाईकोर्ट ने 4 आरोपियों को किया बरी, कहा- ट्रायल के लिए पर्याप्त सबूत नहीं

Shivam
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने मालेगांव ब्लास्ट केस में चार आरोपियों को बरी किया, कहा कि NIA द्वारा पेश साक्ष्य ट्रायल चलाने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय नहीं हैं। - राजेंद्र चौधरी और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य।

मालेगांव ब्लास्ट मामला: बॉम्बे हाईकोर्ट ने 4 आरोपियों को किया बरी, कहा- ट्रायल के लिए पर्याप्त सबूत नहीं

मालेगांव 2006 विस्फोट मामले में एक अहम मोड़ आया है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने चार आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को रद्द करते हुए उन्हें ट्रायल से पहले ही बरी कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि उपलब्ध साक्ष्य इतने मजबूत नहीं हैं कि आरोपियों को मुकदमे का सामना कराया जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 8 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के मालेगांव में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों से जुड़ा है, जिसमें 31 लोगों की मौत और 300 से अधिक लोग घायल हुए थे।

प्रारंभिक जांच महाराष्ट्र एटीएस ने की, बाद में मामला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपा गया और फिर 2011 में जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को ट्रांसफर कर दी गई।

NIA ने 2013 में एक पूरक चार्जशीट दाखिल कर चार नए आरोपियों को मामले में शामिल किया। इसी आधार पर 2025 में विशेष अदालत ने उनके खिलाफ 19 आरोप तय किए थे।

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सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने जांच एजेंसियों द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों की गहराई से जांच की।

अदालत ने कहा कि-

“जज केवल पोस्ट ऑफिस की तरह काम नहीं कर सकता। उसे यह देखना होगा कि क्या वास्तव में आरोप तय करने के लिए पर्याप्त आधार है।”

कोर्ट ने पाया कि NIA का मामला मुख्यतः कबूलनामों और बाद में बदले गए बयानों पर आधारित था, जो कानून के तहत स्वीकार्य नहीं हैं।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि:

• पुलिस हिरासत में दिए गए बयान सामान्यतः सबूत के रूप में मान्य नहीं होते

• टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) को अकेले दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता

• कई गवाहों ने अपने पहले दिए गए बयान से मुकर कर नए बयान दिए, जिससे उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो गई

कोर्ट ने यह भी कहा कि ATS और NIA की कहानियां एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं और दोनों को साथ में स्वीकार करना संभव नहीं है।

“मामले में दो पूरी तरह विपरीत कहानियां सामने आती हैं, जो एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं,” अदालत ने टिप्पणी की।

अदालत ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम और दंड प्रक्रिया संहिता के सिद्धांतों पर जोर देते हुए कहा कि:

• केवल संदेह के आधार पर किसी को ट्रायल में नहीं डाला जा सकता

• आरोप तय करने के लिए “गंभीर संदेह” (grave suspicion) होना जरूरी है

• यदि साक्ष्य कमजोर या अविश्वसनीय हों, तो आरोपी को मुकदमे से राहत मिल सकती है

कोर्ट ने यह भी पाया कि NIA ने “फ्रेश इन्वेस्टिगेशन” की तरह काम किया, जो कानूनन अनुमति नहीं है।

अंततः अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई पर्याप्त और स्वीकार्य साक्ष्य नहीं है, जिससे आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाया जा सके।

“रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री आरोपियों के खिलाफ आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त नहीं है,” कोर्ट ने कहा।

इस आधार पर हाईकोर्ट ने:

• 30 सितंबर 2025 का आरोप तय करने वाला आदेश रद्द किया

• चारों आरोपियों को बरी किया

• उनकी जमानत की शर्तें भी समाप्त कर दीं

Case Details

Case Title: Rajendra Chaudhary & Ors. vs Union of India & Ors.

Case Number: Criminal Appeal No.107 of 2026 & Criminal Appeal (Stamp) No.2772 of 2026

Judge: Chief Justice Shree Chandrashekhar & Justice Shyam C. Chandak

Decision Date: 22 April 2026

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