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मानसिक रूप से अस्वस्थ बेटी को ज़हर देने का मामला: मद्रास हाईकोर्ट ने माता-पिता की उम्रकैद बरकरार रखी

Shivam
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एस. मुनीस्वरन और अन्य बनाम राज्य - मद्रास उच्च न्यायालय ने मंदिर में जहर देने के मामले में माता-पिता की आजीवन कारावास की सजा की पुष्टि की, कहा कि नकारात्मक विसरा रिपोर्ट मजबूत चिकित्सा और रिकॉर्ड साक्ष्य को नकार नहीं सकती।

मानसिक रूप से अस्वस्थ बेटी को ज़हर देने का मामला: मद्रास हाईकोर्ट ने माता-पिता की उम्रकैद बरकरार रखी

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने एक भावनात्मक और गंभीर आपराधिक अपील पर फैसला सुनाते हुए उस दंपती की सज़ा बरकरार रखी है, जिन्हें अपनी नाबालिग बेटी को ज़हर देकर मारने का दोषी ठहराया गया था। अदालत ने साफ कहा कि सिर्फ इसलिए कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ज़हर की पुष्टि नहीं हुई, पूरे मामले को खारिज नहीं किया जा सकता, खासकर जब इलाज लंबा चला हो और मेडिकल रिकॉर्ड कुछ और कहानी बता रहे हों। यह फैसला 13 फरवरी 2026 को सुनाया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला विरुधुनगर जिले का है। अभियोजन के अनुसार, आरोपी पति-पत्नी की बेटी साधना जन्म से मानसिक बीमारी से जूझ रही थी। मां ने बच्ची की देखभाल के लिए अपनी नौकरी तक छोड़ दी थी। परिवार लगातार तनाव में था।

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1 अक्टूबर 2018 को दोनों बच्ची को काथप्पासामी मंदिर ले गए और वहां उसे कीटनाशक “टैफगोर” मिलाकर कोल्ड ड्रिंक में पिलाया। बच्ची की हालत बिगड़ने पर लोग इकट्ठा हुए और उसे अस्पताल ले जाया गया। पहले श्रीविल्लिपुथुर और फिर मदुरै के सरकारी अस्पताल में इलाज चला, लेकिन 6 अक्टूबर 2018 को बच्ची की मौत हो गई।

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ट्रायल कोर्ट ने माता-पिता को गैरकानूनी तरीके से रोकने और हत्या के आरोप में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी। इसी फैसले को चुनौती देते हुए अपील दायर की गई थी।

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि कई गवाह मुकर गए हैं और विसरा रिपोर्ट में ज़हर नहीं मिला, इसलिए सज़ा टिक नहीं सकती। लेकिन अदालत ने मेडिकल रिकॉर्ड और डॉक्टरों की गवाही पर भरोसा किया।

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पीठ ने कहा कि अस्पताल में भर्ती करते समय मां ने खुद बताया था कि दोनों ने मिलकर ज़हर दिया है। दुर्घटना रजिस्टर में यह बात दर्ज थी। एक डॉक्टर ने अदालत में कहा कि बच्ची की हालत और लक्षण ऑर्गेनोफॉस्फेट ज़हर से मेल खाते थे।

अदालत ने यह भी नोट किया कि जिस दुकान से ज़हर खरीदा गया था, उसके मालिक ने आरोपी पिता की पहचान की। जजों ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि लंबे इलाज के बाद कई बार शरीर से ज़हर निकल जाता है, इसलिए विसरा रिपोर्ट नकारात्मक होना अपने आप में मामले को खत्म नहीं करता।

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पीठ ने टिप्पणी की,

“जब बच्ची पूरी तरह माता-पिता की देखरेख में थी और वही उसे अस्पताल लाए, तो यह उनकी जिम्मेदारी थी कि वे बताएं कि ऐसा कैसे हुआ।”

अदालत ने माना कि हालात कठिन रहे होंगे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किसी की जान ली जा सकती है। जजों ने कहा कि कानून किसी को भी यह अधिकार नहीं देता कि वह अपने बच्चे की ज़िंदगी खत्म कर दे, चाहे बच्चा किसी भी बीमारी से पीड़ित हो।

आखिर में पीठ ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई खामी नहीं पाई और अपील खारिज कर दी। पति-पत्नी को दी गई उम्रकैद की सज़ा और जुर्माना दोनों बरकरार रखे गए।

Case Title:- S. Muneeswaran & Anr vs State

Case Number:- Criminal Appeal (MD) No. 76 of 2023

Date of Judgment:- 13 February 2026

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