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मानहानि केस में मेधा पाटकर बरी: साकेत कोर्ट ने कहा– बयान साबित करने के लिए मूल वीडियो पेश नहीं हुआ

Shivam
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वी.के. सक्सेना बनाम मेधा पाटकर - दिल्ली की अदालत ने वी.के. सक्सेना मानहानि मामले में मेधा पाटकर को सबूतों की कमी और अस्वीकार्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का हवाला देते हुए बरी कर दिया।

मानहानि केस में मेधा पाटकर बरी: साकेत कोर्ट ने कहा– बयान साबित करने के लिए मूल वीडियो पेश नहीं हुआ

दिल्ली की साकेत जिला अदालत ने सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर के खिलाफ चल रहे करीब 16 साल पुराने आपराधिक मानहानि मामले में उन्हें बरी कर दिया है। यह मामला वी.के. सक्सेना द्वारा दायर किया गया था, जिसमें आरोप था कि एक टीवी कार्यक्रम के दौरान उनके खिलाफ झूठे और अपमानजनक बयान दिए गए थे। न्यायालय ने साक्ष्यों की गहन जांच के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।

मामले की पृष्ठभूमि

शिकायतकर्ता वी.के. सक्सेना, जो नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज (NCCL) के अध्यक्ष हैं, ने आरोप लगाया था कि 20 अप्रैल 2006 को इंडिया टीवी के कार्यक्रम “ब्रेकिंग न्यूज” में मेधा पाटकर ने यह कहा कि सक्सेना और उनकी संस्था को सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े सिविल कॉन्ट्रैक्ट मिले हैं।

सक्सेना का कहना था कि यह बयान उनकी छवि को नुकसान पहुंचाने वाला है और उन्होंने कभी ऐसा कोई ठेका नहीं लिया। इसी आधार पर उन्होंने भारतीय दंड संहिता की धारा 500 (मानहानि) के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज कराई।

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अदालत के सामने सबसे अहम सवाल यह था कि क्या वास्तव में मेधा पाटकर ने वह कथित बयान दिया था, और क्या इसे कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्यों से साबित किया गया है। न्यायालय को यह भी तय करना था कि टीवी कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग और सीडी/पेन ड्राइव जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य कानून के अनुसार मान्य हैं या नहीं।

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अदालत की टिप्पणियां

न्यायिक मजिस्ट्रेट राघव शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि मामले में सबसे बड़ी कमी यह है कि वह मूल ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग पेश ही नहीं की गई, जिसमें कथित रूप से आरोपी ने बयान दिया था।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा,

“जिस इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड में आरोपी के कथित बयान की मूल रिकॉर्डिंग होनी चाहिए थी, वह अदालत के सामने नहीं लाई गई।”

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अदालत ने यह भी पाया कि जो वीडियो फुटेज पेश की गई, वह केवल टीवी पर प्रसारित कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग थी, जिसमें पहले से रिकॉर्ड किया गया एक छोटा क्लिप चलाया गया था। यह साबित नहीं हो सका कि आरोपी कार्यक्रम में पैनलिस्ट के रूप में मौजूद थीं या उन्होंने वही बयान उसी संदर्भ में दिया था।

अदालत ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को स्वीकार करने के लिए वैध प्रमाणपत्र (65B सर्टिफिकेट) जरूरी है। शिकायतकर्ता द्वारा पेश की गई सीडी के साथ ऐसा कोई प्रमाणपत्र नहीं था, जबकि चैनल की ओर से लाई गई पेन ड्राइव के मामले में भी प्रमाणपत्र देने वाला व्यक्ति संबंधित डिवाइस का जिम्मेदार अधिकारी नहीं पाया गया। इस वजह से दोनों ही साक्ष्य कानूनी रूप से अमान्य ठहराए गए।

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अदालत का अंतिम फैसला

इन सभी तथ्यों और साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित करने में असफल रहा।

न्यायालय ने कहा कि जब यह ही साबित नहीं हो पाया कि आरोपी ने कथित मानहानिकारक बयान दिया, तो आगे के आरोप स्वतः ही टिक नहीं सकते।

इसी आधार पर साकेत अदालत ने मेधा पाटकर को भारतीय दंड संहिता की धारा 500 के तहत लगे आरोप से बरी कर दिया।

Case Title: V.K. Saxena vs. Medha Patkar

Case Number: CC No. 618973/2016

Date of Judgment: 24 January 2026

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