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मुस्लिम कानून के तहत आपसी तलाक का सम्मान किया जाना चाहिए: राजस्थान उच्च न्यायालय का स्पष्ट संदेश

Shivam
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आयशा चौहान बनाम वसीम खान - राजस्थान उच्च न्यायालय ने मुस्लिम विवाह को भंग किया, आपसी सहमति से मुबारत तलाक को बरकरार रखा और पारिवारिक न्यायालय द्वारा तकनीकी अस्वीकृति को पलट दिया।

मुस्लिम कानून के तहत आपसी तलाक का सम्मान किया जाना चाहिए: राजस्थान उच्च न्यायालय का स्पष्ट संदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि जब पति और पत्नी दोनों आपसी सहमति से मुस्लिम कानून के तहत विवाह समाप्त कर चुके हों, तो फैमिली कोर्ट उसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट, मेड़ता के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें तलाक की घोषणा से इनकार कर दिया गया था, जबकि दोनों पक्ष विवाह खत्म होने पर सहमत थे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील 24 वर्षीय आयशा चौहान ने दायर की थी, जिसमें उन्होंने मेड़ता स्थित पारिवारिक न्यायालय के 2025 के आदेश को चुनौती दी थी। उन्होंने यह घोषणा करने की मांग की थी कि मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 के तहत वसीम खान के साथ उनका विवाह भंग हो गया है।

दंपत्ति ने फरवरी 2022 में मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार शादी की थी। इस शादी से कोई संतान नहीं हुई। जल्द ही मतभेद सामने आने लगे और रिश्ता बिगड़ गया। पत्नी के अनुसार, मानसिक तनाव के कारण शादी को जारी रखना असंभव हो गया था।

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विवाह के दौरान, पति ने जून, जुलाई और अगस्त 2024 में तीन अलग-अलग मौकों पर, अलग-अलग मासिक धर्म चक्रों के दौरान, तलाक की घोषणा की। पत्नी ने तीनों बार तलाक स्वीकार कर लिया। बाद में, 20 अगस्त 2024 को, दोनों पक्षों ने स्टांप पेपर पर एक लिखित आपसी तलाक समझौता (मुबारत) पर हस्ताक्षर किए, जिसमें भरण-पोषण और सभी सामान वापस करने का निर्णय लिया गया।

इसके बावजूद, पारिवारिक न्यायालय ने पत्नी का मुकदमा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि क्रूरता साबित नहीं हुई थी और गवाहों की अनुपस्थिति के कारण तलाक अमान्य था।

फैमिली कोर्ट का रुख

फैमिली कोर्ट ने दो मुख्य आधारों पर तलाक़ से इनकार किया-

1. पत्नी क्रूरता के ठोस उदाहरण साबित नहीं कर पाई।

2. तलाक़ के समय दो गवाहों की मौजूदगी साबित नहीं हुई।

इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

अदालत की टिप्पणियां

जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि फैमिली कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ की सही समझ नहीं दिखाई।

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कोर्ट ने स्पष्ट किया,

“जब दोनों पक्ष यह स्वीकार कर रहे हैं कि तीन तुहर में तलाक़ हुआ और पत्नी ने उसे स्वीकार किया, तो केवल गवाहों की कमी के आधार पर तलाक़ को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।”

बेंच ने यह भी कहा कि गवाहों की अनिवार्यता शिया कानून में होती है, जबकि इस मामले में पक्षकार सुन्नी कानून से शासित हैं।

मुबारात पर कोर्ट का दृष्टिकोण

हाईकोर्ट ने माना कि यह केवल आपसी समझौता नहीं, बल्कि मुस्लिम कानून में मान्य ‘मुबारात’ के जरिए विवाह विच्छेद का मामला है। कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट का दायित्व है कि वह ऐसे मामलों में समझौते की स्वैच्छिक प्रकृति की जांच करे और वैवाहिक स्थिति की घोषणा करे।

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कोर्ट ने टिप्पणी की,

“मुबारात एक मान्य तरीका है, जिसमें पति-पत्नी दोनों की सहमति से विवाह समाप्त होता है। अदालत को इसे कानूनी मान्यता देनी चाहिए।”

कोर्ट का निर्णय

इन सभी कारणों के आधार पर राजस्थान हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार की, फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया और यह घोषित किया कि आयशा चौहान और वसीम खान का विवाह मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध रूप से भंग हो चुका है।

Case Title: Ayasha Chouhan v. Waseem Khan

Case Number: D.B. Civil Misc. Appeal No. 1319 of 2025

Date of Judgment: 7 January 2026

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