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नाबालिग की संपत्ति पर विकास परियोजना को सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी, कहा- अदालत का दायित्व बच्चे के कल्याण की रक्षा करना

CB News Desk
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सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग के हिस्से वाली संपत्ति के विकास समझौते को मंजूरी देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में अदालतों को बच्चे के वास्तविक हित और लाभ को प्राथमिकता देनी चाहिए। - शेफाली चक्रवर्ती बनाम पश्चिम बंगाल राज्य

नाबालिग की संपत्ति पर विकास परियोजना को सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी, कहा- अदालत का दायित्व बच्चे के कल्याण की रक्षा करना

सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग की संपत्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि संपत्ति के हस्तांतरण या विकास से जुड़े मामलों में अदालतों का मुख्य उद्देश्य बच्चे के सर्वोत्तम हितों की रक्षा करना होना चाहिए। अदालत ने एक मां को अपने नाबालिग बेटे के हिस्से वाली पैतृक संपत्ति के विकास समझौते को लागू करने की अनुमति दे दी और इसके लिए आवश्यक शर्तें भी निर्धारित कीं।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता शेफाली चक्रवर्ती ने अपने नाबालिग पुत्र बसब चक्रवर्ती की ओर से यह याचिका दायर की थी। बसब को अपने पिता बसुदेब चक्रवर्ती के निधन के बाद पैतृक संपत्ति में हिस्सा प्राप्त हुआ था।

वर्ष 2022 में परिवार के अन्य सह-स्वामियों ने संपत्ति को एक डेवलपर को देने का निर्णय लिया। विकास समझौते के तहत भूमि के बदले मालिकों को फ्लैट और नकद राशि मिलनी थी।

चूंकि संपत्ति का एक हिस्सा नाबालिग के नाम था, इसलिए हिंदू अल्पसंख्यकता एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 8 के तहत अदालत की अनुमति आवश्यक थी। हालांकि, दार्जिलिंग के जिला न्यायाधीश ने आवेदन खारिज कर दिया और बाद में कलकत्ता हाई कोर्ट ने भी उस आदेश को बरकरार रखा।

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

न्यायमूर्ति संजय करोल ने निर्णय लिखते हुए कहा कि धारा 8 का उद्देश्य नाबालिग की संपत्ति को अनुचित हस्तांतरण से बचाना है। अदालत ने विस्तार से समझाया कि प्राकृतिक संरक्षक को नाबालिग की संपत्ति के प्रबंधन का अधिकार तो है, लेकिन अचल संपत्ति के हस्तांतरण के लिए पूर्व न्यायिक अनुमति आवश्यक है।

पीठ ने कहा कि यह व्यवस्था ‘संरक्षकात्मक सिद्धांत’ पर आधारित है, जिसके तहत अदालत नाबालिगों और अपने हितों की रक्षा करने में असमर्थ व्यक्तियों के हितों की संरक्षक के रूप में कार्य करती है।

अदालत ने कहा, “बच्चे का सर्वोत्तम हित केवल एक औपचारिक विचार नहीं है, बल्कि ऐसा सिद्धांत है जो हर मामले में दूरदर्शिता, सावधानी और गहन जांच की मांग करता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर विचार किया कि नाबालिग के लिए क्या अधिक लाभकारी होगा अविकसित भूमि में अविभाजित हिस्सा या विकसित परियोजना में फ्लैट के साथ निश्चित नकद राशि।

पीठ ने कहा कि अविकसित भूमि में हिस्सेदारी अक्सर केवल कागजी अधिकार बनकर रह जाती है, जिसका तत्काल उपयोग या आर्थिक लाभ सीमित होता है। इसके विपरीत, विकसित फ्लैट और नकद राशि बच्चे को वास्तविक और उपयोगी संपत्ति प्रदान करते हैं।

अदालत ने कहा कि ऐसी व्यवस्था नाबालिग के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य की अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने में अधिक सहायक हो सकती है।

निर्णय में कहा गया, “भूमि में हिस्सेदारी को ठोस और लागू किए जा सकने वाले परिसंपत्तियों में बदलना नाबालिग के कल्याण को बढ़ावा देने वाला कदम माना जा सकता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने जिला न्यायाधीश और हाई कोर्ट की उस राय से असहमति जताई जिसमें कहा गया था कि प्रस्तावित फ्लैट के अन्य हिस्सेदारों की पहचान स्पष्ट नहीं है।

पीठ ने कहा कि विकास समझौते में संपत्ति के स्वामित्व का पूरा विवरण दर्ज था और सह-स्वामियों की पहचान स्पष्ट रूप से बताई गई थी। इसलिए इस आधार पर अनुमति से इनकार करना उचित नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए शेफाली चक्रवर्ती को विकास समझौते को लागू करने की अनुमति दे दी।

हालांकि, नाबालिग के हितों की सुरक्षा के लिए अदालत ने कुछ शर्तें भी लगाईं। अदालत ने निर्देश दिया कि विकास समझौते के तहत प्राप्त नकद राशि किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में ऑटो-रिन्यूअल जमा के रूप में रखी जाएगी और नाबालिग के बालिग होने तक सुरक्षित रहेगी।

साथ ही, विकास समझौते में कोई भी बदलाव संबंधित अदालत की अनुमति के बिना नहीं किया जा सकेगा। यदि अन्य सह-स्वामी नाबालिग के बालिग होने से पहले अपने हिस्से को बेचना चाहें, तो उन्हें भी अदालत से अनुमति लेनी होगी।

इन निर्देशों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने जिला न्यायाधीश और हाई कोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए अपील मंजूर कर ली।

Case Details

Case Title: Shephali Chakraborty v. State of West Bengal

Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (Civil) No. 25053 of 2025

Judges: Justice Sanjay Karol and Justice Nongmeikapam Kotiswar Singh

Decision Date: June 3, 2026

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