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नाबालिग से दुष्कर्म मामले में केरल हाईकोर्ट ने सजा बरकरार रखी, आरोपी की अपील खारिज

Shivam
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सुरेश के. बनाम केरल राज्य - केरल उच्च न्यायालय ने पोक्सो और आपराधिक मामले में नाबालिग की अपील को खारिज कर दिया। अविश्वासियों की साज़िशें और मूल्यवर्ग को विश्वसनीय माना जाता है।

नाबालिग से दुष्कर्म मामले में केरल हाईकोर्ट ने सजा बरकरार रखी, आरोपी की अपील खारिज

केरल हाईकोर्ट ने नाबालिग लड़की के साथ बार-बार दुष्कर्म के एक गंभीर मामले में दोषी ठहराए गए आरोपी की आपराधिक अपील खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय है और उपलब्ध साक्ष्य आरोपी के खिलाफ अपराध को स्पष्ट रूप से साबित करते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला कासरगोड जिले का है, जहां अभियोजन के अनुसार आरोपी ने सितंबर 2015 से फरवरी 2016 के बीच एक 13 वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ उसके घर में कई बार दुष्कर्म किया। पीड़िता उस समय अपने परिवार के साथ रह रही थी।

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विशेष सत्र न्यायालय ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(i) और 376(2)(n) तथा पोक्सो अधिनियम की धारा 6 सहपठित धारा 5(ल) के तहत दोषी ठहराया था। उसे 10 वर्ष के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। पीड़िता को मुआवजा देने का आदेश भी दिया गया था।

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आरोपी की दलीलें

हाईकोर्ट में दायर अपील में आरोपी ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि अभियोजन की कहानी झूठी है और कथित घटनाएं घर की परिस्थितियों में संभव नहीं थीं।

आरोपी की ओर से यह भी कहा गया कि पीड़िता की उम्र कानूनी रूप से सिद्ध नहीं की गई है, क्योंकि जन्म प्रमाणपत्र में बच्चे का नाम दर्ज नहीं है। इसके अलावा, आरोपी की कम उम्र को देखते हुए सजा में नरमी की मांग भी की गई।

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अभियोजन का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि पीड़िता की गवाही साफ, स्पष्ट और लगातार है। मेडिकल रिपोर्ट से भी यौन शोषण की पुष्टि होती है। अभियोजन ने कहा कि पीड़िता नाबालिग थी और उस पर बार-बार गंभीर यौन अपराध किया गया, इसलिए सजा में किसी तरह की रियायत नहीं दी जानी चाहिए।

कोर्ट की टिप्पणियां

न्यायमूर्ति बेचु कुरियन थॉमस ने कहा कि नाबालिग पीड़ितों के मामलों में अदालत को अत्यंत संवेदनशील और सतर्क दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। न्यायालय ने माना कि पीड़िता की गवाही “मजबूत और भरोसेमंद” है और उसमें कोई बड़ा विरोधाभास नहीं है।

उम्र के सवाल पर अदालत ने स्पष्ट किया कि पोक्सो मामलों में उम्र तय करने के लिए केवल एक ही तरीके पर निर्भर रहना आवश्यक नहीं है। यदि पीड़िता का बयान, माता-पिता की गवाही और उपलब्ध दस्तावेज आपस में मेल खाते हों, तो उन्हें स्वीकार किया जा सकता है।

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अदालत ने कहा,

“केवल तकनीकी आपत्तियों के आधार पर नाबालिग पीड़िता की उम्र पर संदेह नहीं किया जा सकता, जब समग्र साक्ष्य स्पष्ट हों।”

अंतिम निर्णय

सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद केरल हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। अदालत ने आरोपी की दोषसिद्धि और 10 वर्ष की सजा को बरकरार रखा। पीड़िता को दिए जाने वाले मुआवजे का आदेश भी यथावत रखा गया।

इस प्रकार, आरोपी की आपराधिक अपील खारिज कर दी गई।

Case Title:- Suresh K. v. State of Kerala

Case No:- Crl. A. No. 651 of 2021

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