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क्या नौकरी करने वाली पत्नी भरण-पोषण मांग सकती है? बॉम्बे हाईकोर्ट का अहम फैसला

Shivam
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दीपक गंगाधर दादगे बनाम विजया (पत्नी दीपक दादगे) और अन्य - बॉम्बे उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि ₹1.38 लाख कमाने वाली सरकारी कर्मचारी पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं है, लेकिन घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत बाल सहायता को बरकरार रखा।

क्या नौकरी करने वाली पत्नी भरण-पोषण मांग सकती है? बॉम्बे हाईकोर्ट का अहम फैसला

बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत दिए गए भरण-पोषण आदेश में आंशिक हस्तक्षेप करते हुए साफ कहा है कि यदि पत्नी स्वयं पर्याप्त आय के साथ आत्मनिर्भर है, तो उसे पति से मासिक भरण-पोषण का अधिकार नहीं दिया जा सकता।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी पिता पर बनी रहेगी ।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला डॉक्टर दीपक गंगाधर दाडगे द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका से जुड़ा है। उनकी पत्नी विजया दाडगे और नाबालिग पुत्र ने पहले घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत आवेदन दायर किया था।

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न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, उद्गीर ने पत्नी को ₹12,000 प्रति माह, बेटे को ₹10,000 प्रति माह, साथ ही किराया और मुआवजा देने का आदेश दिया था। इस आदेश को अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने भी बरकरार रखा। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट का रुख किया।

पति की दलीलें

पति की ओर से दलील दी गई कि पत्नी स्वयं एक योग्य डॉक्टर है और राज्य सरकार की मेडिकल ऑफिसर के रूप में कार्यरत है। अदालत को बताया गया कि उनकी मासिक आय लगभग ₹1.38 लाख है और वह नियमित वेतन पाने वाली आयकरदाता हैं।

पति ने यह भी कहा कि पत्नी को सरकारी आवास भत्ता मिल रहा है और वह आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं। इसलिए उन्हें भरण-पोषण देना न तो जरूरी है और न ही कानूनन सही।

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हालांकि, पति ने अदालत में यह बयान भी दिया कि वह अपने बेटे के सभी आवश्यक खर्च उठाने के लिए तैयार हैं।

पत्नी का पक्ष

पत्नी की ओर से दलील दी गई कि भले ही वह नौकरी कर रही हों, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के राजनेश बनाम नेहा फैसले के अनुसार पत्नी को वही जीवन स्तर बनाए रखने का अधिकार है, जो उसे विवाह के दौरान मिला था।

उनका कहना था कि घरेलू हिंसा सिद्ध हो चुकी है और इसी आधार पर निचली अदालतों ने भरण-पोषण का आदेश दिया था।

कोर्ट की टिप्पणियां

न्यायमूर्ति अभय एस. वाघवसे ने साफ कहा कि पुनरीक्षण याचिका में सबूतों का दोबारा विस्तृत मूल्यांकन नहीं किया जाता, बल्कि यह देखा जाता है कि निचली अदालत का आदेश अवैध या गलत तो नहीं है।

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अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के राजनेश बनाम नेहा और चतुर्भुज बनाम सीताबाई मामलों का हवाला देते हुए कहा कि पत्नी की आय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने टिप्पणी की:

“यदि पत्नी स्वयं पर्याप्त आय अर्जित कर रही है और सम्मानजनक जीवन जीने में सक्षम है, तो उसे पति से भरण-पोषण देने का कोई औचित्य नहीं बनता।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि पत्नी के कई खर्चों के दावे दस्तावेजों से साबित नहीं किए गए थे, जबकि उनकी सैलरी स्लिप से यह स्पष्ट था कि वह स्वयं अपने जीवनयापन में सक्षम हैं।

अदालत का अंतिम फैसला

सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के उस हिस्से को रद्द कर दिया, जिसमें पत्नी को ₹12,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश था।

हालांकि, अदालत ने बेटे के लिए ₹10,000 प्रति माह भरण-पोषण जारी रखने का निर्देश दिया और बाकी आदेशों को यथावत रखा।

न्यायमूर्ति वाघवसे ने आदेश में कहा कि बच्चे की जिम्मेदारी से पिता को मुक्त नहीं किया जा सकता, लेकिन आत्मनिर्भर पत्नी को अनिवार्य रूप से भरण-पोषण देना कानून की मंशा नहीं है ।

Case Title: Deepak Gangadhar Dadge vs. Vijaya w/o Deepak Dadge & Another

Case Number: Criminal Revision Application No. 31 of 2024

Pronounced On: 17 January 2026

Advocates:

• For Applicant: Mr. A. A. Yadkikar

• For Respondents: Mr. V. D. Gunale

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