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बेनामी संपत्ति पर NCLT का दखल नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने IBC के तहत चुनौती खारिज की, 5 लाख लागत लगाई

Vivek G.
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एस. राजेंद्रन बनाम आयकर उपायुक्त (बेनामी निषेध) और अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने बेनामी संपत्ति अटैचमेंट को IBC के तहत चुनौती देने से किया इनकार, NCLT के अधिकार क्षेत्र पर बड़ा फैसला।

बेनामी संपत्ति पर NCLT का दखल नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने IBC के तहत चुनौती खारिज की, 5 लाख लागत लगाई

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि बेनामी संपत्ति के अटैचमेंट (कुर्की) आदेश को दिवाला कानून के मंच पर चुनौती नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि यदि कार्रवाई बेनामी कानून के तहत हुई है, तो उसकी वैधता उसी कानून के बनाए गए मंच पर तय होगी, न कि NCLT या NCLAT में।

दो जजों की पीठ-न्यायमूर्ति पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर-ने सभी अपीलें खारिज करते हुए प्रत्येक मामले में 5 लाख रुपये की लागत भी लगाई।

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मामले की पृष्ठभूमि

मामला तमिलनाडु की एक शुगर कंपनी से जुड़ा था। जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया कि कंपनी के शेयर और संपत्तियां एक कथित बेनामी लेन-देन के जरिए खरीदी गई थीं।

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आयकर विभाग की सर्च कार्रवाई के बाद Prohibition of Benami Property Transactions Act, 1988 के तहत नोटिस जारी हुआ और बाद में कंपनी की संपत्तियों को अस्थायी रूप से अटैच कर दिया गया।

इसी बीच कंपनी के खिलाफ Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 (IBC) के तहत दिवाला कार्यवाही शुरू हो गई और बाद में उसे परिसमापन (liquidation) में भेज दिया गया।

लिक्विडेटर ने तर्क दिया कि अटैच की गई संपत्तियां ‘लिक्विडेशन एस्टेट’ का हिस्सा हैं, इसलिए NCLT को हस्तक्षेप करना चाहिए।

NCLT और NCLAT का रुख

चेन्नई स्थित NCLT ने कहा कि बेनामी कानून एक अलग और पूर्ण कानून है, जिसकी अपनी जांच और अपील व्यवस्था है। इसलिए IBC के मंच पर अटैचमेंट आदेश को चुनौती देना संभव नहीं।

अपील में NCLAT ने भी यही कहा कि “जब किसी विशेष कानून ने खुद का अपीलीय ढांचा बना रखा है, तो IBC को समानांतर अपीलीय मंच नहीं बनाया जा सकता।”

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों मंचों के फैसले को सही ठहराया।

पीठ ने कहा,

“IBC का दायरा दिवाला समाधान और परिसमापन तक सीमित है। यह सार्वजनिक कानून के तहत की गई संप्रभु कार्रवाई की समीक्षा का मंच नहीं बन सकता।”

अदालत ने साफ किया कि बेनामी कानून के तहत की गई कुर्की एक “सार्वजनिक हित में की गई संप्रभु कार्रवाई” है, न कि साधारण कर्ज वसूली।

एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी में कोर्ट ने कहा:

“जहां कॉरपोरेट देनदार के पास संपत्ति का वास्तविक लाभकारी स्वामित्व ही नहीं है, वहां वह संपत्ति लिक्विडेशन एस्टेट का हिस्सा नहीं बन सकती।”

Moratorium और Section 32A पर फैसला

लिक्विडेटर ने दलील दी थी कि IBC की धारा 14 के तहत मोरेटोरियम लागू था, इसलिए अटैचमेंट अवैध है।

इस पर कोर्ट ने कहा कि मोरेटोरियम का उद्देश्य कर्जदारों से संपत्ति बचाना है, न कि कथित अपराध से जुड़ी संपत्ति को संरक्षण देना।

धारा 32A पर भी कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान तभी लागू होता है जब रेजोल्यूशन प्लान स्वीकृत हो जाए या परिसमापन बिक्री पूरी हो जाए। यहां ऐसी स्थिति नहीं थी।

फैसले में अदालत ने विस्तार से बताया कि बेनामी कानून और IBC दोनों विशेष कानून हैं, लेकिन दोनों के उद्देश्य अलग हैं।

बेनामी कानून का मकसद अवैध लेन-देन की पहचान और संपत्ति का जब्तीकरण है।

वहीं IBC का उद्देश्य कंपनी को पुनर्जीवित करना या परिसमापन के जरिए संपत्तियों का मूल्य अधिकतम करना है।

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पीठ ने कहा कि

“IBC के मंच का उपयोग कर बेनामी कानून की कार्यवाही को दरकिनार नहीं किया जा सकता।”

फैसला

अंत में सुप्रीम कोर्ट ने सभी अपीलें खारिज कर दीं। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने गलत मंच पर समय बर्बाद किया।

प्रत्येक अपील पर 5 लाख रुपये की लागत लगाई गई, जिसे चार सप्ताह के भीतर जमा करने का आदेश दिया गया।

Case Title: S. Rajendran vs Deputy Commissioner of Income Tax (Benami Prohibition) & Ors.

Case No.: Civil Appeal No. 7140 of 2022 (With Connected Appeals)

Decision Date: 24 February 2026

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