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सरकारी अधिकारी के खिलाफ मुकदमा नहीं चल सकता बिना अनुमति: अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पर राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला

Vivek G.
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राजीव दत्ता बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य। सरकारी अधिकारी के खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले अनुमति जरूरी: अतिक्रमण हटाने के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने संज्ञान आदेश रद्द किया।

सरकारी अधिकारी के खिलाफ मुकदमा नहीं चल सकता बिना अनुमति: अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पर राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला

जयपुर में कथित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को लेकर दर्ज आपराधिक मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि यदि कोई सरकारी अधिकारी अपने आधिकारिक कर्तव्यों के तहत कार्रवाई करता है, तो उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने से पहले सक्षम प्राधिकरण की अनुमति (sanction) आवश्यक होती है। बिना इस अनुमति के अदालत द्वारा संज्ञान लेना कानून के अनुरूप नहीं माना जाएगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 2002 की एक घटना से जुड़ा है। शिकायतकर्ता विजय शर्मा ने जयपुर के बजाज नगर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि 6 मार्च 2002 की सुबह लगभग 50–60 लोग कई वाहनों के साथ मौके पर पहुंचे और परिसर में घुसकर दीवार और गेट को गिरा दिया। इस दौरान संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और वहां मौजूद लोगों को चोट लगने का भी आरोप लगाया गया।

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रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने आईपीसी की धाराओं 147, 451 , 323 , और 427 के तहत एफआईआर दर्ज की। जांच के बाद पुलिस ने नकारात्मक अंतिम रिपोर्ट दाखिल की, लेकिन शिकायतकर्ता की प्रोटेस्ट याचिका पर मजिस्ट्रेट ने 10 फरवरी 2009 को आरोपी के खिलाफ संज्ञान ले लिया। बाद में 21 मई 2018 को पुनरीक्षण अदालत ने भी इस आदेश को बरकरार रखा।

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याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता राजीव दत्ता उस समय जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) में प्रवर्तन अधिकारी (Enforcement Officer) के पद पर कार्यरत थे। उनके वकील ने अदालत में तर्क दिया कि कथित कार्रवाई अतिक्रमण हटाने की आधिकारिक प्रक्रिया का हिस्सा थी।

वकील ने कहा कि चूंकि यह कार्रवाई सरकारी आदेश और आधिकारिक कर्तव्य के तहत की गई थी, इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197 के तहत अभियोजन चलाने से पहले सरकार की पूर्व अनुमति आवश्यक थी।

उन्होंने अदालत से कहा कि निचली अदालत और पुनरीक्षण अदालत ने इस अनिवार्य कानूनी प्रावधान पर पर्याप्त विचार नहीं किया और गलत तरीके से संज्ञान ले लिया।

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अदालत की टिप्पणी

न्यायमूर्ति प्रमिल कुमार माथुर की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि धारा 197 CrPC का उद्देश्य सरकारी अधिकारियों को ऐसे मामलों से बचाना है, जहां उन्होंने अपने आधिकारिक कर्तव्य निभाते हुए कार्रवाई की हो।

अदालत ने कहा: “यदि किसी सरकारी अधिकारी पर लगाया गया आरोप उसके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से सीधे जुड़ा है, तो उसके खिलाफ अभियोजन चलाने से पहले सक्षम प्राधिकरण की अनुमति लेना आवश्यक है।”

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यह जरूरी नहीं कि कार्रवाई पूरी तरह सही या त्रुटिहीन हो। यदि वह सरकारी कर्तव्य से जुड़ी है, तो भी कानूनी संरक्षण लागू होगा।

JDA अधिनियम का भी मिला संरक्षण

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि जयपुर विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1982 की धारा 78 के तहत भी अधिकारियों को संरक्षण दिया गया है।

इस प्रावधान के अनुसार यदि कोई अधिकारी कानून के तहत और सद्भावना (good faith) में कार्रवाई करता है, तो उसके खिलाफ मुकदमा या कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती।

अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई संबंधित अधिकारियों और आयुक्त के निर्देशों के तहत की गई थी। इसलिए इसे पूरी तरह निजी या गैर-आधिकारिक कार्रवाई नहीं माना जा सकता।

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अदालत का निर्णय

सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में धारा 197 CrPC के तहत पूर्व स्वीकृति (sanction) प्राप्त किए बिना मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेना विधिसम्मत नहीं था।

अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस तरह की अनुमति के अभाव में संज्ञान लेने का आदेश अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) के मूल सिद्धांत के विपरीत है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा 10 फरवरी 2009 को पारित संज्ञान आदेश और 21 मई 2018 को पुनरीक्षण अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही याचिकाकर्ता के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाहियों को समाप्त (quash) कर दिया गया।

Case Title: Rajeev Dutta vs State of Rajasthan & Anr.

Case No.: S.B. Criminal Miscellaneous Petition No. 3377/2018

Decision Date: 10 March 2026

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