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40 साल पुराने दोहरे हत्याकांड में दोषियों को राहत नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद बरकरार रखी

Vivek G.
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घनश्याम मंडल और अन्य बनाम बिहार राज्य (अब झारखंड), सुप्रीम कोर्ट ने 1985 के दोहरे हत्याकांड में दोषियों की उम्रकैद बरकरार रखी, हथियार बरामद न होने को राहत का आधार नहीं माना।

40 साल पुराने दोहरे हत्याकांड में दोषियों को राहत नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद बरकरार रखी

करीब चार दशक पुराने दोहरे हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों को कोई राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि चश्मदीद गवाहों की गवाही भरोसेमंद है और केवल हथियार बरामद न होने से पूरा मामला कमजोर नहीं हो जाता। इसी के साथ अपील खारिज कर दी गई।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 15 अगस्त 1985 का है। अभियोजन के अनुसार, खेत और घर के पास मवेशियों के घुसने को लेकर सुबह कहासुनी हुई थी। उसी विवाद ने दोपहर में हिंसक रूप ले लिया।

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सूचना देने वाले चेटन मंडल ने बताया कि उन्होंने अपने भाई बुलाकी मंडल और भतीजे हृदय मंडल को घर से घसीटकर बाहर ले जाते देखा। आरोप था कि कई लोग अलग-अलग हथियारों के साथ आए और दोनों पर हमला किया। गंभीर चोटों के कारण दोनों की मौके पर ही मौत हो गई।

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जांच के बाद आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 के तहत मुकदमा चला। सत्र न्यायालय ने उन्हें दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई, जिसे बाद में झारखंड हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं

अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि सभी गवाह मृतकों के रिश्तेदार थे, इसलिए उनकी गवाही पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता। यह भी कहा गया कि हथियार बरामद नहीं हुए और पोस्टमार्टम रिपोर्ट की मूल प्रति पेश नहीं की गई।

बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि आरोपियों से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत पूछताछ ठीक ढंग से नहीं हुई और इससे उन्हें नुकसान हुआ।

राज्य की ओर से कहा गया कि चारों चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी स्वाभाविक थी और जिरह में उनकी बातों को कमजोर नहीं किया जा सका।

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अदालत की टिप्पणी

पीठ ने रिकॉर्ड और गवाहियों का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने कहा कि गवाहों की गवाही एक-दूसरे से मेल खाती है और घटना का तरीका स्पष्ट बताती है।

फैसले में कहा गया, “सिर्फ इस आधार पर कि गवाह मृतक के रिश्तेदार हैं, उनकी गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता, यदि वह भरोसेमंद हो।”

हथियार बरामद न होने के मुद्दे पर अदालत ने साफ कहा कि यह अपने-आप में अभियोजन के लिए घातक नहीं है। यदि प्रत्यक्षदर्शी गवाही और चिकित्सकीय साक्ष्य मजबूत हों, तो सजा दी जा सकती है।

धारा 313 की पूछताछ पर अदालत ने माना कि सवाल सामान्य थे, लेकिन इससे कोई वास्तविक पूर्वाग्रह साबित नहीं हुआ। न्यायालय ने कहा कि “सिर्फ तकनीकी कमी दिखाना पर्याप्त नहीं, यह भी दिखाना होगा कि उससे न्याय में वास्तविक नुकसान हुआ।”

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अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन ने संदेह से परे अपना मामला सिद्ध किया है। सत्र न्यायालय और हाईकोर्ट के निष्कर्षों में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं है।

इसी के साथ आपराधिक अपील खारिज कर दी गई और दोषियों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी गई।

Case Title: Ghanshyam Mandal and Ors. v. State of Bihar (Now Jharkhand)

Case No.: Criminal Appeal No. 3105 of 2025

Decision Date: 25 February 2026

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