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ओडिशा हाईकोर्ट ने नाबालिग की कस्टडी पर हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज की, सिविल कोर्ट जाने की दी सलाह

Vivek G.
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शशिकांत माझी बनाम ओडिशा राज्य एवं अन्य, ओडिशा हाईकोर्ट ने नाबालिग की कस्टडी मामले में पिता की हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज की, कहा सिविल कोर्ट में जाएं।

ओडिशा हाईकोर्ट ने नाबालिग की कस्टडी पर हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज की, सिविल कोर्ट जाने की दी सलाह

कटक स्थित ओडिशा हाईकोर्ट ने सोमवार को एक अहम आदेश में पिता द्वारा दायर हैबियस कॉर्पस याचिका को खारिज कर दिया। मामला पांच साल के एक नाबालिग बच्चे की कस्टडी से जुड़ा था। अदालत ने साफ कहा कि जब तक बच्चे की कस्टडी अवैध या गैरकानूनी साबित न हो, तब तक रिट कोर्ट सीधे कस्टडी का आदेश नहीं दे सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता शशिकांत माझी ने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए कहा कि उसकी पत्नी की असामयिक मृत्यु के बाद उसका बेटा उसकी मामी और मामा (मातृ पक्ष के रिश्तेदार) के पास रह रहा है।

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पिता का कहना था कि उन्होंने उन्हें केवल अस्थायी रूप से बच्चे की देखभाल के लिए कहा था। लेकिन बाद में वे बच्चे को ओडिशा ले गए और वापस नहीं किया।

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मामला पहले बालासोर की चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (CWC) तक भी गया था। वहां बच्चे को पेश करने का आदेश दिया गया था। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट तक चुनौती में गया, जहां शीर्ष अदालत ने केवल बच्चे को पेश करने की अनुमति दी, लेकिन कस्टडी पर कोई फैसला देने से CWC को रोका।

इसके बाद पिता ने हाईकोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर कर सीधे कस्टडी मांगी।

पिता का तर्क

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि पिता बच्चे का “प्राकृतिक संरक्षक” है, जैसा कि हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षक अधिनियम, 1956 में प्रावधान है।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि हैबियस कॉर्पस याचिका के जरिए भी नाबालिग की कस्टडी पर फैसला दिया जा सकता है।

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उनका कहना था कि “जब पिता जीवित है और प्राकृतिक संरक्षक है, तो किसी और के पास बच्चे की कस्टडी अवैध मानी जानी चाहिए।”

विपक्ष का पक्ष

दूसरी ओर, मामा-मामी की ओर से कहा गया कि बच्चे की मां की मृत्यु के बाद से वही उसकी देखभाल कर रहे हैं।

उनके वकील ने दलील दी कि CWC के आदेश के तहत बच्चे की कस्टडी उनके पास है। जब तक वह आदेश प्रभावी है, तब तक कस्टडी को गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता।

उन्होंने कहा, “यह विवाद सिविल अदालत में तय होना चाहिए, न कि रिट याचिका के माध्यम से।”

अदालत की टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने विस्तृत सुनवाई के बाद कहा कि हैबियस कॉर्पस का उद्देश्य केवल यह देखना है कि किसी व्यक्ति की हिरासत अवैध है या नहीं।

पीठ ने कहा, “यदि कस्टडी प्रथम दृष्टया अवैध या गैरकानूनी नहीं है, तो रिट कोर्ट को विस्तृत जांच करने से बचना चाहिए।”

अदालत ने यह भी दोहराया कि बच्चे के कल्याण (welfare of the child) को सर्वोपरि माना जाता है।

पीठ ने कहा, “सिर्फ यह तथ्य कि पिता प्राकृतिक संरक्षक है, उसे स्वतः पूर्ण अधिकार नहीं देता। बच्चे के हित से जुड़े कई पहलुओं की जांच आवश्यक होती है, जो सिविल अदालत का क्षेत्राधिकार है।”

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि हैबियस कॉर्पस याचिका हर मामले में उपयुक्त उपाय नहीं होती। यदि मामला जटिल है और विस्तृत साक्ष्य की आवश्यकता है, तो पक्षकारों को सिविल कोर्ट जाना चाहिए।

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निर्णय

अदालत ने पाया कि इस मामले में बच्चे की कस्टडी चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के आदेश के तहत मामा-मामी के पास है। इसलिए इसे अवैध या गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता।

पीठ ने कहा, “जब तक सक्षम प्राधिकरण का आदेश प्रभावी है, कस्टडी को अवैध नहीं माना जा सकता।”

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज कर दी। साथ ही स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता चाहे तो संबंधित सिविल अदालत में उचित कार्यवाही कर सकता है।

मामले में लंबित सभी अंतरिम आवेदन भी निरस्त कर दिए गए।

Case Title: Shashikanta Majhi v. State of Odisha & Others

Case No.: WPCRL No.10 of 2026

Decision Date: 23 February 2026

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