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ओडिशा हाईकोर्ट ने पुलिस उत्पीड़न के आरोपों पर याचिका खारिज की, कहा-उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाएं

Shivam
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ओडिशा हाईकोर्ट ने पुलिस उत्पीड़न के आरोपों पर याचिका खारिज की, कहा-उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाएं

उड़ीसा उच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पुलिस द्वारा कथित उत्पीड़न और अधिकारों के उल्लंघन से जुड़े मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले ही कई मंचों पर अपनी शिकायत रख चुका है और उसके पास अन्य वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं।

यह आदेश न्यायमूर्ति सावित्री राठो की एकल पीठ ने 26 फरवरी 2026 को पारित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता अभिजीत आचार्य ने अदालत में दावा किया कि भुवनेश्वर स्थित एक जिम के साथ विवाद के बाद पुलिस ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया।

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उनका कहना था कि जिम में जूते पहनकर प्रवेश करने के मुद्दे पर विवाद हुआ था। इसके बाद उन्होंने जिम के बारे में गूगल पर नकारात्मक समीक्षा पोस्ट की। याचिका के अनुसार, जिम मालिक की शिकायत के बाद 25 फरवरी 2024 को पांच पुलिसकर्मी उनके घर पहुंचे, जहां उन्हें कथित रूप से धमकाया गया और समीक्षा हटाने के लिए दबाव डाला गया।

याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस ने बिना किसी औपचारिक प्राथमिकी के कार्रवाई की और बाद में उनसे जबरन समझौता कराया।

मामले को लेकर उन्होंने कई मंचों का रुख किया, जिनमें सूचना के अधिकार के तहत आवेदन, पुलिस अधिकारियों को शिकायत और ओडिशा मानवाधिकार आयोग के समक्ष याचिका शामिल थी।

राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त स्थायी अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि जिम मालिक की शिकायत पर पुलिस ने केवल प्रारंभिक जांच की थी।

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पुलिस के अनुसार, दोनों पक्षों को थाने बुलाया गया था और 25 फरवरी 2024 को आपसी सहमति से विवाद सुलझा लिया गया था। इसका लिखित रिकॉर्ड भी स्टेशन डायरी में दर्ज किया गया।

राज्य ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता और उसकी मां पहले ही सूचना आयोग और मानवाधिकार आयोग के समक्ष शिकायत कर चुके हैं, जहां मामले पर विस्तृत आदेश पारित किए जा चुके हैं।

अदालत ने कहा कि मानवाधिकार आयोग पहले ही मामले की जांच कर चुका है और अपनी रिपोर्ट में याचिकाकर्ता के आरोपों में कोई ठोस आधार नहीं पाया।

पीठ ने आदेश में कहा कि यदि याचिकाकर्ता को आयोग या सूचना आयोग के आदेशों से आपत्ति है, तो उन्हें कानून के तहत उपयुक्त मंच पर चुनौती दी जा सकती है।

न्यायमूर्ति राठो ने यह भी कहा कि पुलिस को किसी के खिलाफ अवैध कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है और उन्हें हमेशा कानून के अनुसार ही कार्य करना चाहिए।

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साथ ही अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि पुलिस थानों में लगे सीसीटीवी फुटेज को अनिश्चित काल तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता, इसलिए लगभग दो वर्ष बाद उसे संरक्षित रखने का निर्देश देना संभव नहीं है।

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि समझौता या मध्यस्थता विवाद सुलझाने का अच्छा तरीका है, लेकिन यह पूरी तरह स्वैच्छिक होना चाहिए और किसी पक्ष पर दबाव नहीं होना चाहिए।

सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत इस मामले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता।

पीठ ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता चाहे तो मानवाधिकार आयोग या सूचना आयोग के आदेशों को कानून के अनुसार चुनौती दे सकता है और उपलब्ध वैकल्पिक उपायों का उपयोग कर सकता है।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ अदालत ने याचिका का निपटारा कर दिया।

Case Title:- Abhijeet Acharya v. State of Odisha

Case Number:- CRLMP No. 109 of 2026

Date of Judgment:- 26 February 2026

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