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ओडिशा हाईकोर्ट ने खनन पट्टा रद्द करने के आदेश को बरकरार रखा, रॉयल्टी न देने वाले ठेकेदार की याचिका खारिज

Vivek G.
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नरेंद्र नाथ सिंह बनाम ओडिशा राज्य और अन्य, ओडिशा हाईकोर्ट ने रॉयल्टी न चुकाने पर खनन पट्टा रद्द करने के आदेश को सही ठहराया, नरेंद्र नाथ सिंह की रिट याचिका खारिज।

ओडिशा हाईकोर्ट ने खनन पट्टा रद्द करने के आदेश को बरकरार रखा, रॉयल्टी न देने वाले ठेकेदार की याचिका खारिज

खनन पट्टे से जुड़ी एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए ओडिशा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पट्टाधारक लगातार रॉयल्टी और अन्य वैधानिक शुल्क का भुगतान नहीं करता है, तो प्रशासन को पट्टा रद्द करने का अधिकार है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी अधिकारी को अस्थायी रूप से किसी पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है, तो उसके द्वारा लिया गया निर्णय अवैध नहीं माना जा सकता।

मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया और प्रशासनिक कार्रवाई को वैध ठहराया।

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मामले की पृष्ठभूमि

मामला एक खनन पट्टे से संबंधित है। रिकॉर्ड के अनुसार, सरकार ने खनिज स्रोतों की नीलामी के लिए निविदा आमंत्रित की थी, जिसमें नरेंद्र नाथ सिंह सबसे ऊँची बोली लगाने वाले ठहरे। इसके बाद 28 दिसंबर 2020 को उनके साथ पांच वर्षों के लिए पट्टा समझौता किया गया।

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याचिकाकर्ता ने वर्ष 2020–2021 के लिए रॉयल्टी और अन्य शुल्क जमा किए, लेकिन उसके बाद के वित्तीय वर्षों के लिए भुगतान नहीं किया।

खनन विभाग की ओर से पहले मांग पत्र जारी किया गया और फिर याद दिलाने के लिए नोटिस भेजा गया। जब इनका कोई जवाब नहीं मिला, तो खोरधा के माइनिंग ऑफिसर (इंचार्ज) ने 28 नवंबर 2024 और 19 दिसंबर 2024 को कारण बताओ नोटिस जारी किए।

इसके बावजूद कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलने पर विभाग ने ओडिशा माइनर मिनरल कंसेशन नियम, 2016 के तहत कार्रवाई करते हुए पट्टा रद्द कर दिया और जमा सुरक्षा राशि भी जब्त कर ली।

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याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी। उनका मुख्य तर्क था कि उन्होंने पट्टे के नवीनीकरण या विस्तार के लिए आवेदन किया हुआ था, इसलिए उस पर निर्णय लंबित रहते हुए पट्टा रद्द नहीं किया जाना चाहिए था।

इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि पट्टा रद्द करने का अधिकार केवल “कम्पिटेंट अथॉरिटी” को है और माइनिंग ऑफिसर (इंचार्ज) को ऐसा आदेश पारित करने का अधिकार नहीं था।

याचिकाकर्ता के अनुसार, “यह आदेश ऐसे अधिकारी द्वारा पारित किया गया है जिसे नियमों के तहत यह शक्ति प्राप्त नहीं है, इसलिए इसे निरस्त किया जाना चाहिए।”

अदालत की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने मामले में लागू नियमों की विस्तार से व्याख्या की। अदालत ने कहा कि ओडिशा माइनर मिनरल कंसेशन नियम, 2016 के नियम 51(7) के अनुसार, यदि पट्टाधारक पट्टे की शर्तों का उल्लंघन करता है तो सक्षम प्राधिकारी पट्टा रद्द कर सकता है या जुर्माना लगा सकता है।

पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता को कई नोटिस दिए गए थे, लेकिन उन्होंने न तो जवाब दिया और न ही बकाया रॉयल्टी जमा की।

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अदालत ने कहा कि “नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन याचिकाकर्ता ने न तो अधिकारियों से संपर्क किया और न ही आवश्यक भुगतान किया। इससे पट्टे की शर्तों का लगातार उल्लंघन स्पष्ट होता है।”

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि नियमों के अनुसार संबंधित क्षेत्र में माइनिंग ऑफिसर ही सक्षम प्राधिकारी होता है और विभागीय कार्यवाही में रिक्त पद की स्थिति में किसी अधिकारी को जिम्मेदारी देकर काम कराया जाना प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है।

अदालत ने कहा, “प्रशासनिक व्यवस्था में किसी पद के खाली रहने से विभाग का काम रुक नहीं सकता। ऐसे में जिस अधिकारी को जिम्मेदारी दी गई है, उसके द्वारा लिया गया निर्णय अवैध नहीं कहा जा सकता।”

अंतिम निर्णय

सभी तथ्यों और नियमों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि पट्टा रद्द करने का आदेश वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है और इसे किसी अयोग्य अधिकारी द्वारा पारित नहीं किया गया।

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता पट्टे की शर्तों का लगातार उल्लंघन कर रहे थे और नोटिसों का भी कोई जवाब नहीं दिया गया।

इन परिस्थितियों में अदालत ने रिट याचिका को खारिज करते हुए कहा कि प्रशासन की कार्रवाई में कोई अवैधता नहीं है।

पीठ ने आदेश दिया कि “याचिका में कोई ठोस आधार नहीं बनता। इसलिए रिट याचिका खारिज की जाती है।”

Case Title: Narendra Nath Singh vs State of Odisha & Others

Case No.: W.P.(C) No. 2610 of 2026

Decision Date: 17 February 2026

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