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ULC कानून के पुराने घाव फिर खुले: गुजरात की जमीन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कब्जे का सवाल बना निर्णायक

Vivek G.
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दलसुखभाई बच्चूभाई सतासिया और अन्य। बनाम गुजरात राज्य और अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने ULC कानून के तहत कब्जे को लेकर अहम फैसला दिया। बिना नोटिस असली कब्जा नहीं माना जाएगा, Repeal Act लागू होगा।

ULC कानून के पुराने घाव फिर खुले: गुजरात की जमीन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कब्जे का सवाल बना निर्णायक

दिल्ली की सुप्रीम कोर्ट की अदालत में माहौल गंभीर था। गुजरात के सूरत की एक पुरानी ज़मीन विवाद से जुड़ी अपील पर सुनवाई चल रही थी, जिसमें सवाल सिर्फ काग़ज़ी रिकॉर्ड का नहीं, बल्कि असल कब्जे का था। Supreme Court of India ने इस मामले में साफ कर दिया कि केवल सरकारी रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना काफी नहीं, बल्कि यह देखना ज़रूरी है कि जमीन पर वास्तव में किसका कब्जा था।

यह मामला शहरी भूमि सीलिंग कानून (ULC Act) और उसके निरसन (Repeal Act) के बाद पैदा हुए कानूनी विवादों से जुड़ा है, जो वर्षों से अदालतों में उलझे रहे हैं।

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मामले की पृष्ठभूमि

विवाद सूरत के कतारगाम क्षेत्र की एक बड़ी जमीन (सर्वे नंबर 339) से जुड़ा है। यह जमीन पहले एक निजी मालिक के नाम थी। 1976 में शहरी भूमि सीलिंग कानून लागू हुआ, जिसके तहत अतिरिक्त जमीन घोषित करने की प्रक्रिया शुरू हुई।

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1980 में सक्षम प्राधिकारी ने शुरू में माना कि यह जमीन सीलिंग सीमा के भीतर है। इसके बाद यह जमीन एक सहकारी संस्था ने नीलामी में खरीदी और वहां औद्योगिक इकाइयां विकसित की गईं। कई छोटे उद्यमियों ने अपने-अपने प्लॉट पर निर्माण कर लिया और वर्षों से कारोबार करते रहे।

लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी।

1988 में गुजरात सरकार ने पुराने आदेश की समीक्षा करवाई और 1989 में सक्षम प्राधिकारी ने इस जमीन का एक हिस्सा “अतिरिक्त भूमि” घोषित कर दिया।

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इसके बाद 1990 में मूल भूमि मालिक को नोटिस जारी किया गया कि वह जमीन खाली करे। 1992 में सरकारी रिकॉर्ड में यह दिखाया गया कि अतिरिक्त भूमि का कब्जा ले लिया गया है।

समस्या यह थी कि जिन लोगों का कहना था कि वे जमीन पर वर्षों से काबिज हैं, उन्हें कभी नोटिस ही नहीं मिला। उन्हें तब पता चला जब उन्होंने अपनी संपत्ति बेचने के लिए “नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट” (NOC) मांगा और सरकार ने मना कर दिया।

गुजरात हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को “अवैध कब्जाधारी” मानते हुए उनकी याचिकाएं खारिज कर दीं। कोर्ट ने कहा कि जमीन से जुड़े दस्तावेज़ों में पहले से ही ULC कानून की शर्तें दर्ज थीं, इसलिए उन्हें प्रक्रिया की जानकारी होनी चाहिए थी।

यहीं से मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि ULC कानून के तहत कब्जा लेना और जमीन का सरकार में निहित होना, दोनों अलग बातें हैं।

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पीठ ने कहा,

“यदि कोई व्यक्ति वास्तव में जमीन के कब्जे में है, तो उसे बिना नोटिस दिए कब्जे से वंचित नहीं किया जा सकता।”

अदालत ने दो टूक कहा कि धारा 10(5) के तहत कब्जाधारी को नोटिस देना अनिवार्य है। केवल कागज़ों में कब्जा दिखा देना “पेपर पजेशन” माना जाएगा, असली कब्जा नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि यदि 1999 में ULC कानून के निरसन से पहले सरकार ने वास्तविक, भौतिक कब्जा नहीं लिया था, तो ऐसे मामलों में कार्यवाही स्वतः समाप्त (abate) मानी जाएगी।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी रिकॉर्ड में नाम चढ़ा देना या पंचनामा बना देना पर्याप्त नहीं है, जब तक कि जमीन से वास्तविक कब्जा नहीं लिया गया हो।

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अदालत का अंतिम फैसला

इन सभी तथ्यों और कानून की व्याख्या के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया। अदालत ने माना कि कब्जाधारी लोगों को नोटिस दिए बिना कब्जा लेने की प्रक्रिया वैध नहीं थी और ऐसे में निरसन कानून का लाभ मिलेगा।

इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह इस कानूनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए आगे की कार्रवाई करे।

Case Title: Dalsukhbhai Bachubhai Satasia & Ors. vs State of Gujarat & Ors.

Case No.: Civil Appeal No. 6130 of 2016

Case Type: Civil Appeal (Urban Land Ceiling matter)

Decision Date: 06 January 2026

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