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पड़ोसी को दहेज केस में फँसाना गलत: कर्नाटक हाईकोर्ट ने 498A की कार्यवाही रद्द की

Shivam
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आशा जी बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य - कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कानून के दुरुपयोग और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए एक पड़ोसी के खिलाफ आईपीसी की धारा 498ए के तहत दहेज क्रूरता के मामले को रद्द कर दिया।

पड़ोसी को दहेज केस में फँसाना गलत: कर्नाटक हाईकोर्ट ने 498A की कार्यवाही रद्द की

बेंगलुरु स्थित कर्नाटक हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न से जुड़े एक अहम मामले में साफ शब्दों में कहा है कि पति-पत्नी के घरेलू विवाद में किसी पड़ोसी को केवल आरोप के आधार पर घसीटना कानूनन सही नहीं है। अदालत ने एक महिला पड़ोसी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

यह आदेश न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत दायर एक याचिका पर निर्णय लेते हुए पारित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 2006 में हुए एक विवाह से जुड़ा है। विवाह के कई साल बाद पत्नी ने अपने पति, ससुराल पक्ष और एक पड़ोसी महिला के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।

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शिकायत के आधार पर, पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498A, 504, 506 और 323 के साथ धारा 34 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत क्रूरता, दुर्व्यवहार, आपराधिक धमकी और शारीरिक हमले का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज किया।

पुलिस जांच के बाद आरोप पत्र दाखिल किया गया और सभी आरोपियों को समन जारी हुआ। इसी के बाद आरोपी नंबर 5 - जो पति-पत्नी की पड़ोसी थी - ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि:

• वह न तो पति की रिश्तेदार है और न ही परिवार का हिस्सा

• उसके खिलाफ कोई ठोस आरोप नहीं है

• केवल यह कहा गया है कि उसने पति को “उकसाया”, जो धारा 498A के तहत अपराध बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है

वकील ने दलील दी कि ऐसे मामलों में निर्दोष लोगों को फँसाना कानून का दुरुपयोग है।

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राज्य और शिकायतकर्ता का पक्ष

राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से इस याचिका का विरोध किया गया। उनका कहना था कि पड़ोसी महिला की भूमिका ने पति के व्यवहार को प्रभावित किया और इसलिए उस पर भी मुकदमा चलना चाहिए।

अदालत की टिप्पणी

न्यायमूर्ति नागप्रसन्ना ने शिकायत और चार्जशीट का गहन अध्ययन किया। अदालत ने पाया कि:

• शिकायत में याचिकाकर्ता का नाम केवल एक आरोप के रूप में है

• वह पति की “रिश्तेदार” की परिभाषा में नहीं आती

• धारा 498A एक दंडात्मक प्रावधान है, जिसकी व्याख्या सख्ती से की जानी चाहिए

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पड़ोसी या बाहरी व्यक्ति को इस धारा के तहत आरोपी नहीं बनाया जा सकता।

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अदालत ने टिप्पणी की,

“धारा 498A का उद्देश्य पारिवारिक रिश्तों में हुई क्रूरता को दंडित करना है, न कि हर बाहरी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे में घसीटना।”

अंतिम फैसला

हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कार्यवाही जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और इससे न्याय में बाधा आएगी।

अदालत ने आदेश दिया:

• याचिका स्वीकार की जाती है

• संबंधित मजिस्ट्रेट अदालत में चल रही आपराधिक कार्यवाही केवल याचिकाकर्ता (आरोपी नंबर 5) के खिलाफ रद्द की जाती है

• यह आदेश अन्य आरोपियों के मामले को प्रभावित नहीं करेगा

इसी के साथ अदालत ने मामले में याचिकाकर्ता को राहत प्रदान की।

Case Title: Asha G v. State of Karnataka & Anr.

Case Number: Criminal Petition No. 1504 of 2023

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