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पैरोल आदेश के बाद 24 दिनों तक अवैध हिरासत में रखे जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के एक दोषी को ₹11 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया.

CB News Desk
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सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के एक दोषी को 11 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया, जो वैध पैरोल रिहाई आदेश के बावजूद 24 दिनों तक जेल में रहा। कोर्ट ने इसे अवैध हिरासत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया। - दाउदयाल बनाम राजस्थान राज्य और अन्य

पैरोल आदेश के बाद 24 दिनों तक अवैध हिरासत में रखे जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के एक दोषी को ₹11 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया.

व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को एक दोषसिद्ध कैदी को ₹11 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अदालत ने माना कि पैरोल पर रिहाई का न्यायिक आदेश पारित होने और आवश्यक औपचारिकताएं पूरी हो जाने के बावजूद 24 दिनों तक जेल में रखा जाना अवैध हिरासत था और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है.

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने 29 मई 2026 को यह फैसला सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता दौदयाल को एक आपराधिक मामले में चार वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। उनकी सजा और दोषसिद्धि को उच्च न्यायिक मंचों पर भी बरकरार रखा गया, जिसके बाद उन्हें दिसंबर 2021 में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।

सजा का बड़ा हिस्सा काटने के बाद उन्होंने दिसंबर 2023 में स्थायी पैरोल के लिए आवेदन किया। हालांकि, जनवरी 2024 में उनका आवेदन इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि उन्होंने पहले नियमित पैरोल का लाभ नहीं लिया था।

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इस आदेश को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। 5 नवंबर 2024 को हाईकोर्ट की एकल पीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए उनकी रिहाई का आदेश दिया और निजी मुचलके तथा जमानतदार प्रस्तुत करने की शर्त लगाई। सभी शर्तें पूरी होने के बावजूद उनकी रिहाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की, जिस पर 6 दिसंबर 2024 को डिवीजन बेंच ने तत्काल रिहाई का आदेश दिया।

राज्य सरकार का पक्ष

राजस्थान सरकार ने तर्क दिया कि स्थायी पैरोल का आदेश नियमों के अनुरूप नहीं था क्योंकि अपीलकर्ता ने पैरोल की पूर्व निर्धारित तीन अवस्थाओं का लाभ नहीं लिया था। सरकार ने यह भी कहा कि वह हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने पर विचार कर रही थी, इसलिए रिहाई की प्रक्रिया में देरी हुई।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि राज्य ने कभी भी एकल पीठ के आदेश को चुनौती नहीं दी, इसलिए बाद में उसकी वैधता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।

अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी न्यायिक आदेश से असहमति होने का अर्थ यह नहीं है कि सरकारी अधिकारी उसका पालन न करें।

अदालत ने कहा कि “पहले आदेश का पालन करो, बाद में अपील करो” का सिद्धांत कानून के शासन की बुनियाद है। जब तक किसी उच्चतर अदालत द्वारा आदेश पर रोक नहीं लगाई जाती, तब तक वह प्रभावी और बाध्यकारी रहता है।

पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रशासनिक प्रक्रियाओं या अपील दायर करने पर विचार जैसे कारणों के अधीन नहीं रखा जा सकता।

फैसले में अदालत ने अवैध हिरासत की परिभाषा भी स्पष्ट करते हुए कहा:

“राज्य द्वारा किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को वैध अधिकार के बिना या संविधान के प्रावधानों के उल्लंघन में सीमित करना अवैध हिरासत है।”

अदालत ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) की संवैधानिक महत्ता पर भी विस्तार से चर्चा की और कहा कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सबसे प्रभावी न्यायिक उपायों में से एक है।

मुआवजे पर अदालत का दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की उस दलील को भी खारिज कर दिया कि चूंकि अपीलकर्ता एक दोषसिद्ध कैदी था, इसलिए उसकी हिरासत को अवैध नहीं माना जा सकता।

पीठ ने कहा कि एक बार पैरोल मंजूर हो जाए और जमानतदारों का सत्यापन पूरा हो जाए, तो व्यक्ति को जेल में बनाए रखने का कोई कानूनी आधार नहीं बचता।

अदालत ने टिप्पणी की,

“सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति दोषसिद्ध है, इसका अर्थ यह नहीं कि न्याय के तराजू में उसके अधिकारों का महत्व कम हो जाता है।”

पीठ ने कहा कि राज्य का दायित्व है कि उसकी प्रशासनिक प्रक्रियाएं किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को अनावश्यक रूप से प्रभावित न करें।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पैरोल पर रिहाई का आदेश लागू होने और सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी हो जाने के बावजूद अपीलकर्ता को 24 दिनों तक जेल में रखा गया, जो अवैध हिरासत थी।

इसी आधार पर अदालत ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिया कि वह अपीलकर्ता को ₹11 लाख का मुआवजा अदा करे। राशि सीधे उसके बैंक खाते में जमा की जाएगी, जिसकी जानकारी उसके वकील राज्य सरकार को उपलब्ध कराएंगे।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए लंबित सभी आवेदन भी निस्तारित कर दिए।

Case Details

Case Title: Daudayal v. State of Rajasthan & Others

Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 5036 of 2025

Judges: Justice Sanjay Karol and Justice Augustine George Masih

Decision Date: May 29, 2026

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