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निविदा अयोग्यता की मात्र संभावना अनुच्छेद 226 लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है: पटना उच्च न्यायालय

Shivam
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पटना हाईकोर्ट ने कहा कि बिना टेंडर में भाग लिए और बिना किसी वास्तविक अयोग्यता आदेश के केवल आशंका के आधार पर रिट याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती। - एआरपी इंफ्रा प्रोजेक्ट्स (पी) लिमिटेड बनाम बिहार राज्य और अन्य।

निविदा अयोग्यता की मात्र संभावना अनुच्छेद 226 लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है: पटना उच्च न्यायालय

पटना हाईकोर्ट ने एक इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें कंपनी ने आशंका जताई थी कि पश्चिम बंगाल में लगी डिबारमेंट के कारण उसे बिहार सरकार की टेंडर प्रक्रिया से बाहर किया जा सकता है।

अदालत ने साफ कहा कि जब तक कोई वास्तविक प्रशासनिक निर्णय या अधिकारों का उल्लंघन सामने नहीं आता, तब तक केवल अनुमान या आशंका के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत राहत नहीं दी जा सकती।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता कंपनी एआरपी इंफ्रा प्रोजेक्ट्स (P) Ltd. ने बिहार के लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED) द्वारा जारी दो टेंडरों को लेकर अदालत का रुख किया था। कंपनी का कहना था कि पश्चिम बंगाल सरकार के एक विभाग द्वारा जारी डिबारमेंट आदेश को आधार बनाकर बिहार में उसकी पात्रता पर सवाल उठाया जा सकता है।

कंपनी ने अदालत को बताया कि 10 जनवरी 2024 का डिबारमेंट आदेश केवल सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय तथा उससे जुड़ी एजेंसियों के टेंडरों तक सीमित था। इसलिए बिहार PHED के टेंडरों में उसे अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।

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हालांकि राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि कंपनी ने खुद टेंडर प्रक्रिया में भाग ही नहीं लिया। सरकार ने अदालत को बताया कि संबंधित टेंडर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और कार्य एल-1 बोलीदाता को आवंटित किया जा चुका है।

डिवीजन बेंच ने कहा कि रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल केवल वास्तविक और जीवित विवादों में किया जाता है। अदालत ने टिप्पणी की,

“Article 226 के तहत अधिकार असाधारण और उपचारात्मक प्रकृति का है, इसे काल्पनिक या अनुमान आधारित परिस्थितियों में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पहले अंतरिम संरक्षण मिलने के बावजूद कंपनी ने टेंडर में भाग नहीं लिया। अदालत ने कहा कि जब याचिकाकर्ता ने उपलब्ध अवसर का उपयोग ही नहीं किया, तब बाद में केवल संभावित नुकसान का हवाला देकर याचिका बनाए रखना उचित नहीं है।

बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि टेंडर की शर्तें तय करना और उनकी व्याख्या करना मुख्य रूप से टेंडर जारी करने वाली संस्था का अधिकार है। अदालत केवल तब हस्तक्षेप कर सकती है जब निर्णय स्पष्ट रूप से मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या कानून के विपरीत हो।

कोर्ट ने यह भी माना कि ब्लैकलिस्टिंग या डिबारमेंट के आदेश सामान्यतः उसी संस्था तक सीमित रहते हैं जिसने आदेश पारित किया हो। लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि इस सिद्धांत पर विचार तभी होगा जब किसी विभाग ने वास्तव में याचिकाकर्ता के खिलाफ कार्रवाई की हो।

अदालत ने कहा कि इस मामले में न तो कोई अंतिम प्रशासनिक निर्णय लिया गया था और न ही याचिकाकर्ता को वास्तविक कानूनी नुकसान पहुंचा था। इसलिए याचिका केवल “ग़लतफ़हमी” यानी आशंका पर आधारित थी।

इसी आधार पर पटना हाईकोर्ट ने रिट याचिका को गैर-रखरखाव योग्य मानते हुए खारिज कर दिया।

Case Details:

Case Title: Aarpee Infra Projects (P) Ltd. v. State of Bihar & Ors.

Case Number: Civil Writ Jurisdiction Case No. 13104 of 2025

Judges: Justice Sudhir Singh and Justice Shailendra Singh

Decision Date: April 28, 2026

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