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सुनी-सुनाई बातों के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता: पटना उच्च न्यायालय ने आरोपी को बरी किया

Shivam
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पटना हाई कोर्ट ने साक्ष्यों में विरोधाभास और मेडिकल समर्थन के अभाव के आधार पर POCSO मामले में चार आरोपियों को बरी कर दिया। - दीपक कुमार @ सनी एवं अन्य बनाम बिहार राज्य

सुनी-सुनाई बातों के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता: पटना उच्च न्यायालय ने आरोपी को बरी किया

पटना हाई कोर्ट ने 2015 के एक कथित अपहरण और यौन अपराध मामले में चार आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि दोषसिद्धि के लिए साक्ष्य स्पष्ट, सुसंगत और भरोसेमंद होना आवश्यक है, जो इस मामले में नहीं पाया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बिहार के औरंगाबाद जिले के अंबा थाना क्षेत्र से जुड़ा है। 16 मई 2015 को एक नाबालिग लड़की के लापता होने के बाद उसके पिता ने प्राथमिकी दर्ज कराई थी।

अभियोजन के अनुसार, लड़की को रात में घर से ले जाया गया और कुछ दिनों तक कथित रूप से एक स्थान पर रखा गया। बाद में 18 मई 2015 को पुलिस ने उसे गांव के पास से बरामद किया।

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जांच के बाद आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं और POCSO अधिनियम के तहत मामला चलाया गया। ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2018 में आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।

अपील पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने साक्ष्यों का विस्तार से विश्लेषण किया। अदालत ने पाया कि पीड़िता के अलावा अन्य सभी गवाह परिवार के सदस्य थे, जिनकी गवाही प्रत्यक्ष नहीं बल्कि सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थी।

अदालत ने विशेष रूप से पीड़िता के बयानों में अंतर को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट में दिए गए बयान में यौन उत्पीड़न के आरोप शामिल थे, जबकि मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज पहले बयान में ऐसे आरोपों का उल्लेख नहीं था।

अदालत ने कहा,

“ऐसे मामलों में जहां गवाही में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो, वहां सावधानीपूर्वक मूल्यांकन आवश्यक है।”

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मेडिकल साक्ष्यों पर भी अदालत ने ध्यान दिया। डॉक्टरों की रिपोर्ट में शरीर पर किसी प्रकार की ताजा चोट या जबरदस्ती के स्पष्ट संकेत नहीं मिले।

अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यौन अपराध के मामलों में केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर भी दोषसिद्धि हो सकती है, लेकिन वह गवाही विश्वसनीय और सुसंगत होनी चाहिए।

यदि गवाही पूरी तरह भरोसेमंद नहीं है, तो उसे अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों से समर्थन मिलना आवश्यक होता है।

कोर्ट ने साक्ष्यों को तीन श्रेणियों में बांटा:

1. पीड़िता की गवाही

2. परिवार के सदस्यों की गवाही (श्रुत साक्ष्य)

3. मेडिकल और विशेषज्ञ साक्ष्य

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अदालत ने पाया कि पीड़िता की गवाही में महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं और इसे स्वतंत्र साक्ष्यों से पर्याप्त समर्थन नहीं मिला।

साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि जब साक्ष्यों के आधार पर दो संभावित निष्कर्ष निकलते हों, तो वह निष्कर्ष स्वीकार किया जाना चाहिए जो आरोपी के पक्ष में हो।

इन सभी पहलुओं को देखते हुए पटना हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।

अदालत ने सभी आरोपियों को आरोपों से बरी करते हुए तत्काल रिहाई का आदेश दिया, बशर्ते वे किसी अन्य मामले में वांछित न हों।

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