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पत्नी कमाती हो तब भी मिलेगा मेंटेनेंस: गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Shivam
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गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी की कमाई भरण-पोषण से इंकार का आधार नहीं है और पति की याचिका खारिज कर दी। - ललितकुमार जीवराजभाई वाघेला बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य।

पत्नी कमाती हो तब भी मिलेगा मेंटेनेंस: गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

अहमदाबाद की अदालत में बुधवार को एक अहम फैसला सुनाया गया, जिसमें गुजरात हाईकोर्ट ने साफ किया कि केवल इस आधार पर कि पत्नी कुछ कमाती है, उसे भरण-पोषण (maintenance) से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने पति की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उसने फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई ₹15,000 मासिक भरण-पोषण राशि को चुनौती दी थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला ललितकुमार जीव्राजभाई वाघेला बनाम राज्य गुजरात एवं अन्य से जुड़ा है। पत्नी ने पहले धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता(CrPC)के तहत आवेदन कर ₹5,000 मासिक भरण-पोषण हासिल किया था। बाद में परिस्थितियों में बदलाव का हवाला देते हुए उसने धारा 127 के तहत राशि बढ़ाने की मांग की।

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पत्नी ने आरोप लगाया कि पति की आय ₹70,000 से ₹75,000 प्रति माह है और उसने उसे मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना देकर घर से निकाल दिया।

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फैमिली कोर्ट, गांधीनगर ने दोनों पक्षों की दलीलों और साक्ष्यों को सुनने के बाद भरण-पोषण राशि बढ़ाकर ₹15,000 प्रति माह कर दी।

पति की ओर से दलील दी गई कि फैमिली कोर्ट ने तथ्यों को सही तरीके से नहीं देखा।

यह भी कहा गया कि पत्नी सिलाई का काम करती है और करीब ₹15,000 प्रति माह कमाती है, जिसे उसने जानबूझकर छिपाया।

पति ने अपनी आर्थिक जिम्मेदारियों जैसे माता-पिता की देखभाल, किराया और लोन का भी हवाला दिया और कहा कि बढ़ाई गई राशि अनुचित है।

न्यायमूर्ति हसमुख डी. सुथार की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि पत्नी की आय अपने आप में भरण-पोषण से इंकार करने का आधार नहीं बन सकती।

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अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा:

“सिर्फ इस वजह से कि पत्नी कमाती है, उसे भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने यह भी माना कि पत्नी खुद को पूरी तरह से संभालने में सक्षम नहीं है और पति द्वारा उसकी उपेक्षा की गई है।

पीठ ने कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य “सामाजिक न्याय” सुनिश्चित करना है और पति का यह कानूनी व नैतिक कर्तव्य है कि वह अपनी पत्नी को उसी स्तर का जीवन दे, जैसा विवाह के दौरान था।

कोर्ट ने पाया कि पति की आय समय के साथ बढ़ी है और परिस्थितियों में बदलाव आया है, जिससे भरण-पोषण बढ़ाने का आधार बनता है।

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साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि पति के अन्य पारिवारिक दायित्वों के बावजूद पत्नी के प्रति उसकी जिम्मेदारी खत्म नहीं होती।

फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई ₹15,000 राशि को अदालत ने उचित और संतुलित माना।

अदालत ने कहा:

“आवेदक कोई स्पष्ट त्रुटि दिखाने में असफल रहा है, और निचली अदालत ने उचित कारणों के साथ आदेश पारित किया है।”

इसके साथ ही गुजरात हाईकोर्ट ने पति की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया और फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।

Case Details

Case Title: Lalitkumar Jivrajbhai Vaghela vs State of Gujarat & Anr.

Case Number: Criminal Revision Application No. 283 of 2021

Decision Date: March 17, 2026

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