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यदि पत्नी के पारिवारिक हिंसा से पति की कमाई की क्षमता नष्ट हो जाती है तो पत्नी अंतरिम भरण-पोषण की हकदार नहीं है: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

Shivam
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विनीता बनाम डॉ. वेद प्रकाश सिंह - इलाहाबाद उच्च न्यायालय, धारा 125 सीआरपीसी, अंतरिम भरण-पोषण, पत्नी के भरण-पोषण का मामला, पति की आय क्षमता, पारिवारिक न्यायालय का आदेश, आपराधिक पुनरीक्षण, भारतीय भरण-पोषण कानून, सीआरपीसी के तहत भरण-पोषण, वैवाहिक विवाद

यदि पत्नी के पारिवारिक हिंसा से पति की कमाई की क्षमता नष्ट हो जाती है तो पत्नी अंतरिम भरण-पोषण की हकदार नहीं है: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक संवेदनशील पारिवारिक विवाद में स्पष्ट किया है कि भरण-पोषण का अधिकार तथ्यों से जुड़ा होता है, केवल वैवाहिक दर्जे से नहीं। न्यायालय ने उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार किया गया था, क्योंकि पति गंभीर गोली लगने की चोट के कारण कमाने में असमर्थ हो गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला विनीता बनाम डॉ. वेद प्रकाश सिंह से जुड़ा है। पत्नी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत अंतरिम भरण-पोषण की मांग की थी। पारिवारिक न्यायालय, कुशीनगर ने 7 मई 2025 को आवेदन खारिज कर दिया था।

पत्नी ने उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी और दलील दी कि पति एक होम्योपैथिक डॉक्टर है, इसलिए उसके पास “पर्याप्त साधन” हैं।

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रिकॉर्ड से यह तथ्य सामने आया कि 13 अप्रैल 2019 को पति के क्लिनिक पर पत्नी के भाई और पिता सहित कुछ लोग पहुंचे। कथित तौर पर वहां झगड़ा हुआ और पति पर गोली चलाई गई। गोली का छर्रा आज भी रीढ़ की हड्डी में फंसा है। डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि इसे निकालने पर पक्षाघात का खतरा है।

इसी चोट के कारण पति लंबे समय से बैठकर काम करने में असमर्थ है और उसकी कमाई पूरी तरह बंद हो चुकी है।

अदालत की मुख्य टिप्पणियां

न्यायमूर्ति लक्ष्मी कांत शुक्ला ने कहा कि सामान्य तौर पर पति पर पत्नी का भरण-पोषण करना एक “नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी” है। लेकिन हर मामला अपने तथ्यों पर तय होता है।

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पीठ ने टिप्पणी की,

“यदि पत्नी या उसके परिवार के आचरण से पति की कमाने की क्षमता नष्ट हो जाती है, तो वह उसी स्थिति का लाभ उठाकर भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून पति की जिम्मेदारी को उसकी वास्तविक कमाने की क्षमता से जोड़ता है, न कि केवल पेशे या डिग्री से।

हाईकोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि भरण-पोषण का उद्देश्य सामाजिक न्याय है, लेकिन यह यांत्रिक रूप से नहीं दिया जा सकता। पति की आय, स्वास्थ्य और परिस्थितियां—सब कुछ देखना जरूरी है।

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अदालत ने कहा कि जहां पति शारीरिक रूप से काम करने में अक्षम हो गया हो, वहां उसे केवल “कमाने की संभावना” के आधार पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत का निर्णय

सभी तथ्यों और रिकॉर्ड को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि पारिवारिक न्यायालय का आदेश न तो मनमाना था और न ही अवैध। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र का सही इस्तेमाल किया है।

इसी आधार पर पत्नी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई और अंतरिम भरण-पोषण से इनकार का आदेश बरकरार रखा गया।

Case Title: Vineeta v. Dr. Ved Prakash Singh

Case Number: Criminal Revision No. 8658 of 2025

Date of Decision: 19 January 2026

Bench: Justice Lakshmi Kant Shukla

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