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फिजियोथेरेपिस्ट ‘डॉ.’ लिख सकते हैं नाम के आगे: केरल हाईकोर्ट ने मेडिकल डॉक्टरों की याचिकाएं खारिज कीं

Shivam
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इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (केरल) और अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य - केरल उच्च न्यायालय ने डॉक्टरों की याचिका खारिज करते हुए फिजियोथेरेपिस्टों की पेशेवर भूमिका को बरकरार रखा और एनसीएएचपी अधिनियम, 2021 के तहत 'डॉक्टर' उपसर्ग के उपयोग की अनुमति दी।

फिजियोथेरेपिस्ट ‘डॉ.’ लिख सकते हैं नाम के आगे: केरल हाईकोर्ट ने मेडिकल डॉक्टरों की याचिकाएं खारिज कीं

केरल हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े एक बड़े विवाद पर स्पष्ट फैसला सुनाते हुए कहा है कि फिजियोथेरेपिस्ट और ऑक्यूपेशनल थैरेपिस्ट अपने नाम के आगे “डॉ.” लिख सकते हैं। अदालत ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) और अन्य डॉक्टर संगठनों की याचिकाएं खारिज कर दीं, जिनमें इस प्रथा पर रोक लगाने की मांग की गई थी

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला राष्ट्रीय सहयोगी और स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर अधिनियम, 2021 (NCAHP Act) और इसके तहत जारी Competency Based Curriculum से जुड़ा था। डॉक्टर संगठनों का कहना था कि फिजियोथेरेपिस्ट और ऑक्यूपेशनल थैरेपिस्ट केवल सहायक भूमिका निभाते हैं और उन्हें मरीजों का स्वतंत्र रूप से इलाज करने या “डॉ.” की उपाधि इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं होना चाहिए।

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याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि ऐसा करना राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 (NMC Act) की भावना के खिलाफ है और इससे आम लोगों में भ्रम पैदा हो सकता है।

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अदालत में क्या दलीलें रखी गईं

डॉक्टर संगठनों की ओर से कहा गया कि “डॉ.” शब्द आमतौर पर एलोपैथिक डॉक्टरों से जुड़ा होता है और फिजियोथेरेपिस्ट द्वारा इसका प्रयोग मरीजों को गुमराह कर सकता है।

वहीं, फिजियोथेरेपिस्ट और ऑक्यूपेशनल थैरेपिस्ट की ओर से दलील दी गई कि NCAHP Act उन्हें स्वतंत्र पेशेवर के रूप में मान्यता देता है और उनकी शिक्षा व प्रशिक्षण व्यापक और वैधानिक है। उन्होंने यह भी कहा कि कानून कहीं भी “डॉ.” शब्द के इस्तेमाल पर रोक नहीं लगाता।

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कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां

जस्टिस वी. जी. अरुण ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि अदालत किसी संसदीय कानून की नीति में दखल नहीं दे सकती। फैसले में अदालत ने टिप्पणी की,

“NCAHP अधिनियम के तहत योग्य स्वास्थ्य पेशेवरों को रोकने का कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है, और केवल आशंका के आधार पर उनकी भूमिका सीमित नहीं की जा सकती।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि फिजियोथेरेपिस्ट और ऑक्यूपेशनल थैरेपिस्ट दवाइयां लिखने या एलोपैथिक इलाज करने के हकदार नहीं हैं, लेकिन उनकी सेवाएं रोकथाम, पुनर्वास और उपचार सहायता तक सीमित रहते हुए स्वतंत्र रूप से दी जा सकती हैं।

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‘डॉ.’ उपाधि पर अदालत का रुख

हाईकोर्ट ने “डॉ.” शब्द के इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि यह शब्द केवल मेडिकल डॉक्टरों तक सीमित नहीं है। अदालत ने कहा,

“डॉक्टर शब्द मूल रूप से विद्वान या शिक्षक के लिए प्रयोग होता था और आज भी कई क्षेत्रों में उच्च शैक्षणिक डिग्री धारक इसका उपयोग करते हैं।”

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कोर्ट ने यह भी नोट किया कि NMC Act या अन्य किसी मौजूदा कानून में मेडिकल डॉक्टरों को ही “डॉ.” लिखने का विशेष अधिकार नहीं दिया गया है।

अंतिम फैसला

इन सभी कारणों के आधार पर केरल हाईकोर्ट ने डॉक्टर संगठनों की सभी याचिकाएं खारिज कर दीं और कहा कि फिजियोथेरेपिस्ट व ऑक्यूपेशनल थैरेपिस्ट के अधिकारों में दखल देने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।

Case Title: Indian Medical Association (Kerala) & Ors. vs Union of India & Ors.

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