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पीड़िता के नाबालिग होने का कोई विश्वसनीय सबूत नहीं: जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने वैधानिक बलात्कार के आरोप में दोषी ठहराए जाने का फैसला रद्द किया

Shivam Y.

जम्मू और कश्मीर उच्च न्यायालय ने बलात्कार के एक मामले में दोषसिद्धि को पलट दिया, यह मानते हुए कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की उम्र को निर्णायक रूप से स्थापित करने में विफल रहा और साक्ष्य से पता चलता है कि संबंध सहमति से बना था। - यावर अहमद भगत बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश पी/एस यारीपोरा के माध्यम से

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पीड़िता के नाबालिग होने का कोई विश्वसनीय सबूत नहीं: जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने वैधानिक बलात्कार के आरोप में दोषी ठहराए जाने का फैसला रद्द किया
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जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में रेप के मामले में दोषी ठहराए गए युवक को राहत देते हुए उसकी सजा और दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि घटना के समय युवती नाबालिग थी। साथ ही रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि दोनों के बीच प्रेम संबंध था और युवती अपनी इच्छा से आरोपी के साथ गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला वर्ष 2018 का है। युवती के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी बेटी बाजार जाने के बाद घर नहीं लौटी और आरोपी उसे अपने साथ ले गया। जांच के दौरान पुलिस ने युवती को आरोपी के साथ बरामद किया। बाद में मेडिकल जांच और अन्य सामग्री के आधार पर रेप का आरोप भी जोड़ा गया।

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ट्रायल कोर्ट ने मार्च 2025 में आरोपी को धारा 376 आरपीसी के तहत दोषी ठहराते हुए आठ वर्ष की सजा सुनाई थी। अदालत ने यह माना था कि युवती 18 वर्ष से कम उम्र की थी, इसलिए उसकी सहमति कानूनी रूप से महत्व नहीं रखती।

अपील की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने युवती के बयान, स्कूल रिकॉर्ड और अन्य गवाहों की गवाही का विस्तार से परीक्षण किया।

अदालत ने पाया कि युवती ने जांच और मुकदमे के दौरान कई बार कहा कि वह आरोपी के साथ अपनी मर्जी से गई थी। उसने यह भी स्वीकार किया कि दोनों के बीच प्रेम संबंध थे और शारीरिक संबंध भी उसकी इच्छा से बने थे।

न्यायमूर्ति संजय धर की पीठ ने कहा, “अभियोजन पक्ष पर यह दायित्व है कि वह संदेह से परे साबित करे कि पीड़िता घटना के समय नाबालिग थी।”

हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष मुख्य रूप से स्कूल प्रमाणपत्र पर निर्भर था, जिसमें युवती की जन्मतिथि दर्ज थी। लेकिन रिकॉर्ड पेश करने वाले शिक्षक यह नहीं बता सके कि जन्मतिथि किस आधार पर स्कूल रजिस्टर में दर्ज की गई थी।

अदालत ने यह भी नोट किया कि युवती के पिता और उसकी बड़ी बहन भी उसकी सही जन्मतिथि बताने में असमर्थ रहे।

कोर्ट ने कहा कि केवल स्कूल रिकॉर्ड के आधार पर उम्र को अंतिम रूप से सिद्ध नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब उस रिकॉर्ड की मूल आधार सामग्री उपलब्ध न हो।

हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह साबित नहीं होता कि युवती घटना के समय 18 वर्ष से कम आयु की थी। ऐसे में यह मामला वैधानिक बलात्कार (Statutory Rape) का नहीं माना जा सकता।

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अदालत ने यह भी माना कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि दोनों के बीच प्रेम संबंध थे और युवती आरोपी के साथ अपनी इच्छा से गई थी।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील स्वीकार कर ली। अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया तथा आरोपी को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो।

Case Details

Case Title: Yawar Ahmad Bhagat v. UT of J&K Through P/S Yaripora

Case Number: CrlA(S) No. 03/2025

Judge: Justice Sanjay Dhar

Decision Date: 24 April 2026

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