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पिता-ससुर की मृत्यु के बाद भी विधवा बहू को भरण-पोषण का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

Vivek G.
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सुप्रीम कोर्ट का फैसला: ससुर की मृत्यु के बाद विधवा हुई बहू भी हिंदू कानून के तहत भरण-पोषण की हकदार होगी।

पिता-ससुर की मृत्यु के बाद भी विधवा बहू को भरण-पोषण का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू परिवार कानून से जुड़े एक अहम सवाल पर स्पष्ट और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि यदि कोई बहू अपने ससुर की मृत्यु के बाद विधवा होती है, तो भी वह ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की हकदार मानी जाएगी। यह फैसला हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की व्याख्या को लेकर लंबे समय से चली आ रही कानूनी उलझन को खत्म करता है

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला दिवंगत डॉ. महेंद्र प्रसाद के परिवार से जुड़ा है, जिनका निधन दिसंबर 2021 में हुआ था। उनके तीन बेटे थे। आरोप था कि डॉ. महेंद्र प्रसाद ने 2011 में एक वसीयत के जरिए अपनी अधिकांश संपत्ति अपने एक बेटे की पत्नी कंचना राय के बच्चों के नाम कर दी और बाकी बेटों को नजरअंदाज कर दिया।

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इसी बीच, एक अन्य बेटे की पत्नी गीता शर्मा ने अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की मांग करते हुए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की। फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि ससुर की मृत्यु के समय वह विधवा नहीं थीं। बाद में हाईकोर्ट ने यह आदेश पलट दिया और कहा कि याचिका सुनवाई योग्य है।

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मुख्य कानूनी सवाल

सुप्रीम कोर्ट के सामने असली सवाल यह था- क्या ऐसी बहू, जो ससुर की मृत्यु के बाद विधवा होती है, ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की ‘निर्भर’ (dependant) मानी जाएगी या नहीं?

कोर्ट की अहम टिप्पणियां

न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने कानून की सीधी भाषा पर जोर दिया। अदालत ने हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम की धारा 21(vii) का हवाला देते हुए कहा कि इसमें साफ तौर पर “पुत्र की विधवा” शब्द का इस्तेमाल किया गया है, न कि “पूर्व-मृत पुत्र की विधवा”।

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पीठ ने टिप्पणी की,

“कानून की भाषा स्पष्ट है। जब शब्द साफ हैं, तो अदालत उन्हें बदल या जोड़ नहीं सकती।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि विधवा होने का समय मायने नहीं रखता। अगर बहू अपने पति की मृत्यु के बाद विधवा हो जाती है और स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ है, तो वह निर्भर मानी जाएगी।

अदालत ने यह भी माना कि अगर भरण-पोषण का अधिकार सिर्फ उन बहुओं तक सीमित कर दिया जाए, जिनके पति ससुर से पहले गुजर गए हों, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन होगा।

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पीठ ने कहा,

“विधवाओं के बीच केवल पति की मृत्यु के समय के आधार पर भेद करना मनमाना और अनुचित होगा।”

साथ ही, अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि संकीर्ण व्याख्या से महिलाओं को असहाय स्थिति में धकेला जा सकता है।

अंतिम फैसला

इन सभी बिंदुओं पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया। अदालत ने साफ कहा कि पुत्र की कोई भी विधवा चाहे वह ससुर की मृत्यु के बाद विधवा हुई हो ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की हकदार है, बशर्ते वह स्वयं अपनी जरूरतें पूरी करने में असमर्थ हो।

इसके साथ ही, कंचना राय और अन्य अपीलकर्ताओं की अपीलें खारिज कर दी गईं। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि वह गीता शर्मा की याचिका पर कानून के अनुसार merits पर फैसला करे।

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