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निजी स्कूल फीस नियंत्रण कानून बरकरार, लेकिन हाईकोर्ट ने बदली FFRC प्रमुख नियुक्ति की व्यवस्था

Vivek G.
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न्यू कॉन्वेंट हाई स्कूल और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य, जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने निजी स्कूल फीस नियंत्रण कानून को बरकरार रखा, लेकिन FFRC प्रमुख के रूप में केवल हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज की नियुक्ति का निर्देश दिया।

निजी स्कूल फीस नियंत्रण कानून बरकरार, लेकिन हाईकोर्ट ने बदली FFRC प्रमुख नियुक्ति की व्यवस्था

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने निजी स्कूलों की फीस नियंत्रित करने से जुड़े कानून को वैध ठहराया, लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रावधान को असंवैधानिक बताते हुए उसमें बदलाव का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि निजी स्कूलों की फीस निर्धारण समिति (FFRC) का प्रमुख केवल हाईकोर्ट का सेवानिवृत्त न्यायाधीश ही होना चाहिए।

यह फैसला कई निजी स्कूलों द्वारा दाखिल याचिका पर दिया गया, जिसमें फीस नियमन से जुड़े संशोधनों और आदेशों को चुनौती दी गई थी।

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मामले की पृष्ठभूमि

याचिका कई निजी स्कूलों-जैसे न्यू कॉन्वेंट हाई स्कूल, गोगजी बाग श्रीनगर और अन्य शिक्षण संस्थानों-ने दायर की थी। स्कूलों ने जम्मू-कश्मीर स्कूल एजुकेशन एक्ट, 2002 में किए गए संशोधनों और फीस निर्धारण समिति (FFRC) को दिए गए अधिकारों को चुनौती दी थी।

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सरकार ने 2020 और 2022 के आदेशों के माध्यम से कानून में संशोधन करते हुए निजी स्कूलों की फीस तय करने और नियंत्रित करने के लिए एक वैधानिक समिति बनाई थी।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ये संशोधन निजी, गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों की स्वायत्तता में हस्तक्षेप करते हैं। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार ऐसे संस्थानों को अपनी फीस संरचना तय करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, बशर्ते वे मुनाफाखोरी या कैपिटेशन फीस न लें।

डिवीजन बेंच ने कहा कि भारत में निजी स्कूल शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं और कई मामलों में उन्होंने सरकारी स्कूलों की कमी को पूरा किया है।

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अदालत ने कहा: “निजी स्कूलों की स्थापना नागरिकों द्वारा किया गया निवेश है और इसे पूरी तरह से परोपकारी गतिविधि मानना वास्तविकता से परे होगा।”

साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षा को व्यापार की तरह चलाना या अत्यधिक लाभ कमाना कानून के विरुद्ध है।

बेंच ने कहा कि फीस नियमन का उद्देश्य केवल “व्यावसायीकरण और अनुचित मुनाफाखोरी” को रोकना होना चाहिए, न कि स्कूलों के प्रशासन में अनावश्यक हस्तक्षेप करना।

हाईकोर्ट ने कहा कि जम्मू-कश्मीर स्कूल एजुकेशन एक्ट, 2002 में जो संशोधन करके सेक्शन 20A से 20J जोड़े गए हैं, वे संविधान या सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के खिलाफ नहीं हैं।

अदालत ने कहा कि फीस निर्धारण और नियमन के लिए FFRC जैसी वैधानिक संस्था बनाना सरकार का वैध कदम है, जिसका उद्देश्य शिक्षा में मुनाफाखोरी रोकना है।

हालांकि अदालत ने एक महत्वपूर्ण प्रावधान पर आपत्ति जताई।

सेक्शन 20A(2) में यह प्रावधान था कि FFRC का अध्यक्ष या तो हाईकोर्ट का पूर्व न्यायाधीश हो सकता है या फिर सरकार का सेवानिवृत्त वित्तीय आयुक्त स्तर का अधिकारी।

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इस पर अदालत ने कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुरूप नहीं है।

बेंच ने कहा:“फीस निर्धारण समिति का प्रमुख केवल हाईकोर्ट का सेवानिवृत्त न्यायाधीश होना चाहिए, जिसे संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित किया जाए।”

अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि इस प्रावधान में संशोधन किया जाए।

स्कूलों द्वारा परिवहन शुल्क बढ़ाने के मुद्दे पर अदालत ने कहा कि स्कूल बस सुविधा अनिवार्य नहीं है, बल्कि यह छात्रों और अभिभावकों की सुविधा के लिए दी जाने वाली अतिरिक्त सेवा है।

अदालत ने FFRC को निर्देश दिया कि वह परिवहन विभाग और उपभोक्ता मामलों के विभाग के अधिकारियों को शामिल कर एक समिति बनाए, जो स्कूलों के लिए परिवहन शुल्क तय करने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश तैयार करे।

जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक 6 अक्टूबर 2022 के FFRC आदेश के अनुसार तय परिवहन शुल्क लागू रहेगा।

अंत में हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि फीस नियमन से जुड़ी कानूनी व्यवस्था वैध है, लेकिन FFRC प्रमुख की नियुक्ति से जुड़ा प्रावधान सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप संशोधित किया जाना चाहिए।

Case Title: New Convent High School & Ors. v. Union of India & Ors.

Case No.: WP(C) No. 1070/2022

Decision Date: 28 January 2026

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