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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 2003 आत्महत्या मामले में सौतेली मां को बरी किया, कहा- ‘जाओ और मरो’ जैसी टिप्पणी से नहीं बनता अपराध’

Vivek G.
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गुगन राम और अन्य बनाम हरियाणा राज्य, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 2003 आत्महत्या मामले में सौतेली मां को बरी किया। कोर्ट ने कहा कि ‘Go and Die’ जैसी टिप्पणी से आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध सिद्ध नहीं होता।

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 2003 आत्महत्या मामले में सौतेली मां को बरी किया, कहा- ‘जाओ और मरो’ जैसी टिप्पणी से नहीं बनता अपराध’

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 2003 में एक नाबालिग लड़की की कथित आत्महत्या के मामले में दोषी ठहराई गई सौतेली मां को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित ही नहीं कर पाया कि लड़की ने आत्महत्या की थी। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गुस्से में कही गई कोई एक टिप्पणी, बिना स्पष्ट इरादे के, आत्महत्या के लिए उकसाने (abetment) का अपराध नहीं बनती।

यह फैसला न्यायमूर्ति रुपिंदरजीत चहल की एकल पीठ ने सुनाया।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले से जुड़ा है। शिकायतकर्ता लक्ष्मण सिंह ने आरोप लगाया था कि उसकी 16 वर्षीय भांजी सुषमा, जो अपने पिता और सौतेली मां के साथ रह रही थी, मानसिक रूप से परेशान थी।

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परिवार का आरोप था कि लड़की ने 6 जुलाई 2003 को फोन पर अपने रिश्तेदारों को बताया कि उसके पिता उसके साथ अनुचित व्यवहार करते हैं और उसे अपनी जान का खतरा है। अगले दिन जब रिश्तेदार गांव पहुंचे तो उन्हें पता चला कि लड़की की मृत्यु हो चुकी है और उसका अंतिम संस्कार भी कर दिया गया है।

इसके बाद 12 जुलाई 2003 को पुलिस में शिकायत दी गई और आईपीसी की धारा 306, 354 और 201 के तहत मामला दर्ज किया गया।

ट्रायल कोर्ट का फैसला

सत्र न्यायालय ने सुनवाई के बाद पिता और सौतेली मां दोनों को दोषी ठहराया था। अदालत ने दोनों को आत्महत्या के लिए उकसाने (Section 306 IPC) का दोषी मानते हुए सात साल की सजा सुनाई थी।

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हालांकि अपील के दौरान पिता की 2022 में मृत्यु हो गई, जिसके कारण उनके खिलाफ अपील समाप्त हो गई और मामला केवल सौतेली मां सोमता देवी के संबंध में जारी रहा।

अदालत की प्रमुख टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को धारा 306 आईपीसी के तहत दोषी ठहराने के लिए दो बातें साबित होना जरूरी है-

1. मृतक ने आत्महत्या की हो

2. आरोपी ने उसे आत्महत्या के लिए उकसाया हो

अदालत ने पाया कि इस मामले में इन दोनों बुनियादी तत्वों को साबित नहीं किया गया।

कोर्ट ने कहा:

“आत्महत्या के अपराध में सबसे पहले यह साबित होना जरूरी है कि मृत्यु वास्तव में आत्महत्या थी। केवल संदेह के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।”

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मेडिकल और साक्ष्य से जुड़ी कमियां

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में कई गंभीर कमियां हैं।

• लड़की का पोस्टमार्टम नहीं कराया गया

• राख और हड्डियों की फोरेंसिक जांच में कोई जहर नहीं मिला

• शिकायत दर्ज कराने में छह दिन की देरी हुई

अदालत ने कहा कि इन परिस्थितियों में यह निश्चित रूप से कहना संभव नहीं है कि मृत्यु आत्महत्या थी।

‘जाकर मर जाओ’ जैसी टिप्पणी पर अदालत का दृष्टिकोण

मामले में सौतेली मां पर मुख्य आरोप यह था कि जब लड़की ने अपने पिता के व्यवहार की शिकायत की तो उसने कथित तौर पर कहा कि अगर उसे शर्म आती है तो वह जहर खाकर मर जाए।

अदालत ने कहा कि अगर यह कथन मान भी लिया जाए, तब भी यह केवल एक आकस्मिक टिप्पणी (stray remark) प्रतीत होती है और इससे यह साबित नहीं होता कि आरोपी ने जानबूझकर लड़की को आत्महत्या के लिए उकसाया।

कोर्ट ने कहा:

“केवल एक टिप्पणी, बिना स्पष्ट इरादे और प्रत्यक्ष संबंध के, आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध सिद्ध नहीं करती।”

हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय

सभी साक्ष्यों और परिस्थितियों की समीक्षा करने के बाद अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में असफल रहा है।

अदालत ने कहा कि मामले में चिकित्सा साक्ष्य की कमी, एफआईआर में देरी, और आरोपी के खिलाफ ठोस प्रमाण न होने के कारण संदेह उत्पन्न होता है।

अंततः हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को रद्द करते हुए सौतेली मां सोमता देवी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

Case Title: Gugan Ram & Anr. vs State of Haryana

Case No.: CRA-S-2198-SB-2004

Decision Date: 23 February 2026

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