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राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस इंस्पेक्टर की अनिवार्य सेवानिवृत्ति रद्द की, कहा- ‘उत्कृष्ट रिकॉर्ड वाले अफसर को अयोग्य नहीं कहा जा सकता’

Shivam
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अरविंद चरण बनाम राजस्थान राज्य और अन्य - राजस्थान उच्च न्यायालय ने इंस्पेक्टर अरविंद चरण की अनिवार्य सेवानिवृत्ति रद्द कर उन्हें बहाल करने का आदेश दिया और कहा कि अधिकारियों ने उनके मजबूत सेवा रिकॉर्ड की अनदेखी की।

राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस इंस्पेक्टर की अनिवार्य सेवानिवृत्ति रद्द की, कहा- ‘उत्कृष्ट रिकॉर्ड वाले अफसर को अयोग्य नहीं कहा जा सकता’

जोधपुर स्थित राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में पुलिस इंस्पेक्टर अरविंद चरण की अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश रद्द कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि जिस अधिकारी का हाल के वर्षों का सेवा रिकॉर्ड “बहुत अच्छा” और “उत्कृष्ट” रहा हो, उसे केवल पुराने और छोटे दंडों के आधार पर अयोग्य बताकर हटाया नहीं जा सकता। यह फैसला न्यायमूर्ति फरजंद अली की एकल पीठ ने सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

अरविंद चरण ने 1996 में सब-इंस्पेक्टर के रूप में सेवा शुरू की थी और 2009 में उन्हें इंस्पेक्टर पद पर पदोन्नति मिली। उन्होंने कई संवेदनशील जिम्मेदारियों में काम किया और उनके वार्षिक गोपनीय आख्या (ACR) में लगातार अच्छे अंक दर्ज होते रहे।

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हालांकि, 9 जुलाई 2020 को विभाग ने उन्हें यह कहते हुए अनिवार्य सेवानिवृत्त कर दिया कि वे “अप्रभावी” हो गए हैं। अधिकारी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी और कहा कि यह फैसला नियमों और तय प्रक्रिया के खिलाफ है।

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अदालत की सुनवाई और अवलोकन

सुनवाई के दौरान अदालत ने रिकॉर्ड देखा और पाया कि पिछले कई वर्षों में याचिकाकर्ता को “बहुत अच्छा” और कुछ वर्षों में “उत्कृष्ट” ग्रेड मिला था। अदालत ने टिप्पणी की, “जिस अधिकारी का हालिया प्रदर्शन लगातार सराहनीय रहा हो, उसे एक साथ अयोग्य और अप्रभावी बताना अपने आप में विरोधाभास है।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि विभाग ने मुख्य रूप से पुराने और छोटे दंडों पर भरोसा किया, जो पहले ही समाप्त हो चुके थे। ऐसे मामलों को आधार बनाकर अनिवार्य सेवानिवृत्ति देना, व्यावहारिक रूप से एक तरह की दूसरी सजा जैसा हो जाता है, जो कानून के अनुसार सही नहीं है।

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फैसले में अदालत ने याद दिलाया कि नियम 53(1) के तहत अनिवार्य सेवानिवृत्ति केवल “जनहित” में और पूरे सेवा रिकॉर्ड के निष्पक्ष मूल्यांकन के बाद ही हो सकती है। खास तौर पर, यदि आधार “अप्रभाविता” हो, तो पिछले पांच वर्षों के कामकाज को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

पीठ ने कहा, “चयनित रूप से केवल नकारात्मक बातों को देखना और अच्छे रिकॉर्ड को नजरअंदाज करना, निर्णय प्रक्रिया में गंभीर चूक दिखाता है।”

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अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का जिक्र करते हुए बताया कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति कोई सजा नहीं है, लेकिन इसका इस्तेमाल दंड देने के शॉर्टकट की तरह भी नहीं किया जा सकता। यदि रिकॉर्ड में हाल के वर्षों में अच्छा काम दिखता है, तो केवल पुराने आरोपों के आधार पर अधिकारी को हटाना मनमाना माना जाएगा।

अंतिम फैसला

इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने 9 जुलाई 2020 का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने विभाग को निर्देश दिया कि अरविंद चरण को सेवा में बहाल किया जाए और उस तारीख से सभी काल्पनिक (नोटशनल) लाभ दिए जाएं, जिस दिन उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्त किया गया था। साथ ही, अदालत ने कहा कि इस मामले में कोई लागत नहीं लगाई जाएगी।

Case Title: Arvind Charan vs State of Rajasthan & Ors.

Case Number: S.B. Civil Writ Petition No. 12748/2020

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