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बलात्कार के मामलों में दोषसिद्धि केवल संदेह के आधार पर नहीं की जा सकती; फोरेंसिक खामियों के कारण दोषसिद्धि घातक साबित होती है: उत्तराखंड उच्च न्यायालय

Shivam
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उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फॉरेंसिक साक्ष्य में खामियों के चलते गैंगरेप दोषसिद्धि रद्द की, एक आरोपी बरी हुआ, दूसरे को केवल अपहरण में दोषी माना गया। - मूल चंद्र @ मूला बनाम उत्तराखंड राज्य और भूप सिंह @ भूपाली बनाम राज्य

बलात्कार के मामलों में दोषसिद्धि केवल संदेह के आधार पर नहीं की जा सकती; फोरेंसिक खामियों के कारण दोषसिद्धि घातक साबित होती है: उत्तराखंड उच्च न्यायालय

नैनीताल स्थित उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक संवेदनशील आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट के निर्णय में आंशिक बदलाव किया। अदालत ने कहा कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि केवल संदेह के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस और भरोसेमंद साक्ष्य पर आधारित होनी चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 2018 की घटना से जुड़ा है, जब एक युवती के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। बाद में उसे डरी हुई हालत में बरामद किया गया। परिजनों ने संकेतों के आधार पर आरोप लगाया कि उसके साथ मारपीट और यौन उत्पीड़न हुआ।

पुलिस जांच के दौरान दो व्यक्तियों मूल चंद्र और भूप सिंह का नाम सामने आया। सीसीटीवी फुटेज में युवती को एक व्यक्ति के साथ जाते हुए देखा गया। इसके बाद दोनों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा चलाया गया।

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डिवीजन बेंच ने साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण करते हुए कहा:

“आपराधिक कानून में दोषसिद्धि ठोस और कानूनी रूप से सिद्ध साक्ष्य पर आधारित होनी चाहिए, केवल संदेह पर्याप्त नहीं है।”

अदालत ने मेडिकल रिपोर्ट पर ध्यान देते हुए कहा कि:

• मेडिकल जांच में स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकला

• स्पर्म नहीं मिला, और डॉक्टर ने “निश्चित राय नहीं दी जा सकती” कहा

फॉरेंसिक साक्ष्य पर भी अदालत ने गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने पाया कि:

• साक्ष्य की chain of custody (जब्ती से जांच तक सुरक्षित रखे जाने की प्रक्रिया) स्पष्ट रूप से साबित नहीं हुई

• कुछ अहम दस्तावेज और जब्ती मेमो रिकॉर्ड पर नहीं थे

“यदि साक्ष्य की श्रृंखला में खामियां हों, तो फॉरेंसिक रिपोर्ट को निर्णायक नहीं माना जा सकता,” अदालत ने कहा।

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अदालत ने माना कि:

• भूप सिंह के खिलाफ मुख्य आधार फॉरेंसिक साक्ष्य था

• लेकिन उस साक्ष्य की विश्वसनीयता संदिग्ध रही

वहीं, मूल चंद्र के संबंध में:

• कोई DNA, रक्त या अन्य वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं मिला

• केवल “आखिरी बार साथ देखा गया” (last seen) परिस्थिति थी

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

“सिर्फ साथ देखे जाने से यौन अपराध में सहभागिता सिद्ध नहीं होती।”

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अदालत ने दोनों अपीलों पर अलग-अलग निर्णय दिए:

भूप सिंह

• धारा 376(2)(l) और 376-D IPC के तहत दोषसिद्धि रद्द

• साक्ष्य पर्याप्त न होने के कारण बरी

• तत्काल रिहाई के आदेश

मूल चंद्र

• रेप और गैंगरेप से संबंधित धाराओं से बरी

• धारा 366-A IPC भी हटाई गई

• लेकिन धारा 363 IPC (अपहरण) में दोषसिद्धि बरकरार

अदालत ने नोट किया कि:

• पीड़िता बौद्धिक रूप से सक्षम नहीं थी

• उसे बिना अभिभावक की अनुमति के ले जाना अपराध है

चूंकि मूल चंद्र पहले ही 4 वर्ष की सजा काट चुका था, अदालत ने उसकी भी रिहाई का आदेश दिया।

Case Details

Case Title: Mool Chandra @ Moola vs State of Uttarakhand & Bhup Singh @ Bhupali vs State

Case Number: Criminal Appeal No. 143 of 2019 & Criminal Jail Appeal No. 11 of 2019

Judges: Justice Ravindra Maithani & Justice Ashish Naithani

Decision Date: 12 February 2026

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