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पंजीकृत विक्रय विलेख को पुख्ता सबूत के बिना "फर्जी" घोषित नहीं किया जा सकता; पंजीकरण से प्रबल कानूनी मान्यता प्राप्त होती है: सर्वोच्च न्यायालय

Shivam
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हेमलता (D) LRS. द्वारा बनाम तुकाराम (D) LRS. द्वारा और अन्य - सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि पंजीकृत बिक्री विलेखों में मजबूत कानूनी अनुमान होता है, दशकों पुराने विवाद में संपत्ति दस्तावेजों को फर्जी घोषित करने के लिए सख्त परीक्षण निर्धारित किया गया है।

पंजीकृत विक्रय विलेख को पुख्ता सबूत के बिना "फर्जी" घोषित नहीं किया जा सकता; पंजीकरण से प्रबल कानूनी मान्यता प्राप्त होती है: सर्वोच्च न्यायालय

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी पंजीकृत (Registered) बिक्री विलेख को यूँ ही “शाम” या “नाममात्र का दस्तावेज़” घोषित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि रजिस्ट्रेशन अपने आप में दस्तावेज़ की वैधता और वास्तविकता का मजबूत अनुमान पैदा करता है, जिसे ठोस और ठहराव वाले सबूतों के बिना तोड़ा नहीं जा सकता।

हेमलता (D) बनाम तुकाराम (D) और अन्य के मामले में न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति मनमोहन ने फैसला सुनाया। यह मामला निचली अदालत, अपीलीय अदालत, उच्च न्यायालय से होते हुए लगभग पांच दशकों की कानूनी लड़ाई के बाद अंततः सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा।

Background of the Case

मामला कर्नाटक के बीदर स्थित एक मकान से जुड़ा है। वर्ष 1971 में मकान मालिक तुकाराम ने आर्थिक तंगी के चलते अपनी संपत्ति ₹10,000 में हेमलता के नाम एक रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए बेची। उसी दिन एक रजिस्टर्ड रेंट एग्रीमेंट भी बनाया गया, जिसके तहत तुकाराम परिवार उसी मकान में किराएदार के रूप में रहने लगा।

कुछ समय बाद किराया न देने पर मकान मालकिन ने बेदखली की कार्यवाही शुरू की। इसके जवाब में तुकाराम ने दीवानी अदालत में मुकदमा दायर कर दावा किया कि बिक्री विलेख असल में बिक्री नहीं, बल्कि एक नाममात्र का दस्तावेज़ था और वास्तविक मंशा गिरवी (Mortgage) की थी।

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निचली अदालतों का रुख

ट्रायल कोर्ट ने तुकाराम के पक्ष में फैसला देते हुए बिक्री विलेख को “शाम” माना। हालांकि, जिला अदालत ने इस फैसले को पलटते हुए कहा कि लिखित और पंजीकृत दस्तावेज़ के सामने मौखिक साक्ष्य स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इसके बाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बहाल कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि यह साबित करने के लिए मौखिक साक्ष्य दिए जा सकते हैं कि दस्तावेज़ को कभी अमल में लाने का इरादा ही नहीं था।

Supreme Court’s Observation

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की इस सोच से असहमति जताई। पीठ ने कहा,

“एक रजिस्टर्ड बिक्री विलेख के साथ वैधता और वास्तविकता की मजबूत धारणा जुड़ी होती है। इसे हल्के में ‘शाम’ घोषित करना न्यायिक अनुशासन के खिलाफ है।”

कोर्ट ने जोर देकर कहा कि केवल यह कहना कि दस्तावेज़ नाममात्र का था, काफी नहीं है। ऐसे दावे के लिए ठोस तथ्य, स्पष्ट दलीलें और विश्वसनीय सबूत जरूरी हैं।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि:

• बिक्री विलेख और किरायानामा दोनों रजिस्टर्ड थे

• दस्तावेज़ों की भाषा स्पष्ट और बिना किसी शर्त के थी

• गिरवी या पुनः बिक्री (re-conveyance) से जुड़ी कोई शर्त बिक्री विलेख में दर्ज नहीं थी

• किराया कई महीनों तक दिया गया, जो मालिक-किरायेदार संबंध को दर्शाता है

Court’s Decision

इन सभी तथ्यों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह लेन-देन पूरी तरह वास्तविक बिक्री थी, न कि सशर्त गिरवी। कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और जिला अदालत द्वारा दिया गया फैसला बहाल कर दिया, जिससे बिक्री विलेख को वैध माना गया और उसे “शाम” कहने का दावा खारिज हो गया।

Case Title: Hemalatha (D) By LRS. v. Tukaram (D) By LRS. & Others

Case Number: Civil Appeal No. 6640 of 2010

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