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'कोर्ट का समय बर्बाद कर रहे हैं': सावरकर की तस्वीर हटाने वाली PIL पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, याचिका वापस

Vivek G.
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बालासुंदरम बालमुरुगन बनाम भारत संघ एवं अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने संसद से सावरकर की तस्वीर हटाने की मांग वाली PIL पर सख्त रुख अपनाया, लागत की चेतावनी दी और याचिका अंततः वापस ले ली गई।

'कोर्ट का समय बर्बाद कर रहे हैं': सावरकर की तस्वीर हटाने वाली PIL पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, याचिका वापस

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान माहौल तब सख्त हो गया, जब याचिकाकर्ता ने संसद भवन और अन्य सार्वजनिक स्थलों से विनायक दामोदर सावरकर की तस्वीरें हटाने की मांग रखी। अदालत ने इस याचिका को समय की बर्बादी बताते हुए कड़ी टिप्पणी की और भारी लागत लगाने की चेतावनी दी। आखिरकार याचिकाकर्ता ने खुद ही याचिका वापस ले ली।

मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका सेवानिवृत्त आईआरएस अधिकारी बालासुंदरम बालमुरुगन ने दायर की थी। उनकी मांग थी कि संसद के सेंट्रल हॉल सहित अन्य सरकारी जगहों से सावरकर की तस्वीरें हटाई जाएं। साथ ही उन्होंने यह भी आग्रह किया कि जिन लोगों पर गंभीर अपराधों या राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के आरोप रहे हों और जो सम्मानपूर्वक बरी न हुए हों, उन्हें सरकारी सम्मान न दिया जाए।

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मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ के सामने सूचीबद्ध हुआ।

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मुख्य न्यायाधीश ने कहा,

“आप आईआरएस में रहे हैं, दिल्ली आकर अदालत के सामने पेश होना कोई बड़ी बात नहीं होनी चाहिए। आप अदालत का समय बर्बाद कर रहे हैं।”

कोर्ट की टिप्पणियाँ

बेंच ने यह साफ़ कर दिया कि जनहित याचिका के नाम पर अदालतों को वैचारिक लड़ाइयों का मंच नहीं बनाया जा सकता। जजों के अनुसार, PILs असली सार्वजनिक मुद्दों को सुलझाने के लिए होती हैं, न कि व्यक्तिगत या राजनीतिक मतभेदों के लिए।

पीठ ने यह भी कहा कि इस तरह की याचिकाएं अक्सर “फ्रिवोलस” यानी बिना ठोस आधार की होती हैं, जिनसे न्यायिक समय का नुकसान होता है।

जब याचिकाकर्ता ने कहा कि उनकी याचिका “जनहित” में है, तो अदालत ने साफ शब्दों में जवाब दिया।

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सीजेआई सूर्या कांत ने टिप्पणी की,

“हम आप पर एक लाख रुपये की लागत लगा सकते हैं, तब आपको समझ आएगा कि जनहित का असली मतलब क्या होता है।”

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने सावरकर की तस्वीर हटाने से जुड़ी PIL को वापस ली गई मानते हुए बंद कर दिया। अदालत ने यह साफ कर दिया कि इस तरह की याचिकाएं न्यायपालिका का कीमती समय लेती हैं और जरूरत पड़ने पर इन पर भारी लागत भी लगाई जा सकती है।

Case Title: Balasundaram Balamurugan vs Union of India & Ors.

Case No.: W.P.(C) No. 1095/2025

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