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19 साल के इंतजार के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात पुलिस को कुछ ही हफ्तों में जालसाजी मामले की जांच पूरी करने का आदेश दिया।

CB News Desk
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सुप्रीम कोर्ट ने 2007 से लंबित गुजरात जालसाजी मामले की जांच में हो रही लंबी देरी की आलोचना की और पुलिस को छह सप्ताह के भीतर जांच पूरी करके रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। - साहिल अब्दुलसत्तार मंसूरी एवं अन्य। वी. सफीमहमद फफिरभाई मंसूरी और अन्य।

19 साल के इंतजार के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात पुलिस को कुछ ही हफ्तों में जालसाजी मामले की जांच पूरी करने का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने लगभग दो दशकों से लंबित एक आपराधिक जांच पर गंभीर नाराजगी जताते हुए कहा कि न्याय में अत्यधिक देरी न्याय से वंचित करने के समान है। अदालत ने गुजरात पुलिस को निर्देश दिया कि वह छह सप्ताह के भीतर जांच पूरी कर संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष उचित रिपोर्ट प्रस्तुत करे।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह आदेश उस मामले में दिया, जिसमें मूल शिकायतकर्ता वर्षों से कथित जालसाजी और भूमि हड़पने के आरोपों की जांच पूरी कराने के लिए विभिन्न अदालतों का दरवाजा खटखटा रहे थे।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला गुजरात के भिलोड़ा गांव स्थित एक भूमि से जुड़ा है। शिकायतकर्ता का आरोप था कि वर्ष 2002 में हज यात्रा पर रहने के दौरान कुछ लोगों ने उनकी कथित रूप से फर्जी हस्ताक्षरों का उपयोग कर विभाजन व बिक्री से संबंधित दस्तावेज तैयार किए। बाद में इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज करा लिए गए।

इस संबंध में वर्ष 2007 में आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई थी। जांच के दौरान फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) की रिपोर्ट भी प्राप्त हुई, जिसमें कथित रूप से यह निष्कर्ष सामने आया कि विवादित दस्तावेजों पर शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर नहीं थे। इसके बावजूद जांच अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकी।

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सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में लगभग 19 वर्ष बीत जाने के बाद भी जांच किसी ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुंची है, जो बेहद चिंताजनक स्थिति है।

पीठ ने कहा, “मूल शिकायतकर्ता चारों ओर भटकता रहा, लेकिन उसकी शिकायत पर चार्जशीट दाखिल नहीं की गई।”

अदालत ने यह भी कहा कि त्वरित जांच और सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। यदि किसी मामले में जांच असामान्य रूप से लंबी अवधि तक लंबित रहती है, तो संवैधानिक अदालतों को मूक दर्शक नहीं बने रहना चाहिए।

राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि जांच से जुड़े मूल दस्तावेज और केस रिकॉर्ड अदालत भेजे जाने के दौरान गुम हो गए थे। संबंधित अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी शुरू की गई थी। राज्य ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड उपलब्ध न होने और कुछ गवाहों का पता न चल पाने के कारण जांच पूरी नहीं हो सकी।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं दिखा। अदालत ने कहा कि यदि जांच आगे नहीं बढ़ पा रही थी तो संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष उचित रिपोर्ट दाखिल की जानी चाहिए थी। रिकॉर्ड से ऐसा कोई कारण दिखाई नहीं देता कि मामला इतने लंबे समय तक लंबित क्यों रखा गया।

पीठ ने यह भी कहा कि सक्रिय जांच के दौरान रिकॉर्ड का गुम हो जाना आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए गंभीर चिंता का विषय है और इससे वास्तविक शिकायतें भी निष्प्रभावी हो सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात राज्य और भिलोड़ा पुलिस स्टेशन को निर्देश दिया कि वे छह सप्ताह के भीतर जांच पूरी कर संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष उचित रिपोर्ट दाखिल करें। अदालत ने राज्य सरकार को एक हलफनामा दाखिल करने का भी आदेश दिया, जिसमें रिकॉर्ड गुम होने के लिए जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ की गई कार्रवाई, जांच में हुई देरी के कारण और अदालत के निर्देशों के अनुपालन की जानकारी दी जाए।

मामले को आगे की सुनवाई के लिए 14 जुलाई 2026 को सूचीबद्ध किया गया है।

Case Details

Case Title: Sahil Abdulsattar Mansuri & Ors. v. Safimahamad Fafirbhai Mansuri & Ors.

Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 17479 of 2025

Judges: Justice Sanjay Karol and Justice Augustine George Masih

Decision Date: June 4, 2026

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