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Limitation पर सुप्रीम कोर्ट की स्पष्टता: देर से चार्जशीट होने पर भी केस नहीं होगा खत्म

Vivek G.
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में सीमा अवधि की गणना शिकायत दाखिल करने की तारीख से होगी, न कि अदालत द्वारा संज्ञान लेने की तारीख से। - रोमा आहूजा बनाम राज्य और अन्य

Limitation पर सुप्रीम कोर्ट की स्पष्टता: देर से चार्जशीट होने पर भी केस नहीं होगा खत्म

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आपराधिक मामलों में सीमा अवधि (limitation) की गणना के लिए अदालत द्वारा संज्ञान लेने की तारीख नहीं, बल्कि शिकायत या अभियोजन शुरू करने की तारीख अहम होती है। यह फैसला एक पुराने झगड़े से जुड़े मामले में आया, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट ने FIR को समय सीमा से बाहर मानकर रद्द कर दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला रोमा आहूजा बनाम राज्य एवं अन्य से जुड़ा है। यह विवाद 9 मई 2011 को दिल्ली के मोती नगर स्थित कोर्ट परिसर के बाहर हुए कथित मारपीट से संबंधित था।

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शिकायतकर्ता के अनुसार, प्रतिवादी-जो एक वकील थे-ने उन्हें गाली दी और मारपीट की, जिससे उन्हें चोटें आईं। इस घटना के बाद दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ क्रॉस-FIR दर्ज कराई।

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जिस FIR पर विवाद था (FIR No. 121/2011), उसमें आरोप थे कि चार्जशीट घटना के एक साल से अधिक समय बाद दाखिल की गई, जिससे यह सीमा अवधि से बाहर हो गई।

दिल्ली हाई कोर्ट ने 30 जनवरी 2025 को कहा कि चूंकि चार्जशीट एक साल और 20 दिन बाद दाखिल हुई थी, इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 468 के तहत यह मामला समय सीमा से बाहर है।

हाई कोर्ट ने FIR और उससे जुड़ी पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए कानून की स्थिति स्पष्ट की।

पीठ ने कहा,

“सीमा अवधि की गणना के लिए महत्वपूर्ण तारीख वह है जब शिकायत दाखिल की गई या अभियोजन शुरू हुआ, न कि जब मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लिया।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संज्ञान लेना (taking cognizance) पूरी तरह न्यायालय की प्रक्रिया है, जिस पर शिकायतकर्ता का कोई नियंत्रण नहीं होता।

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“यदि अदालत की देरी के कारण किसी मामले को समय सीमा से बाहर मान लिया जाए, तो यह एक सतर्क शिकायतकर्ता के साथ अन्याय होगा,” कोर्ट ने कहा।

CrPC की धारा 468 के अनुसार,

• एक साल तक की सजा वाले अपराधों के लिए सीमा अवधि एक वर्ष होती है।

इस मामले में आरोप धारा 323 (मारपीट) के तहत थे, जिसकी अधिकतम सजा एक साल है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने संविधान पीठ के फैसले (Sarah Mathew केस) का हवाला देते हुए दोहराया कि:

• शिकायत दाखिल करने की तारीख ही सीमा अवधि तय करने के लिए निर्णायक होती है

• अदालत की प्रक्रिया में देरी का नुकसान शिकायतकर्ता को नहीं दिया जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और कहा कि FIR को केवल इस आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता कि चार्जशीट देर से दाखिल हुई।

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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामला सीमा अवधि के भीतर था क्योंकि शिकायत समय पर दर्ज की गई थी।

Case Details

Case Title: Roma Ahuja v. The State and Another

Case Number: Criminal Appeal Nos. 1831–1832 of 2026

Judge: Justice N.V. Anjaria & Prashant Kumar Mishra

Decision Date: APRIL 09, 2026

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