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अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत आरोप तय करने के लिए पीड़िता का बयान ही पर्याप्त है: केरल उच्च न्यायालय

Shivam
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रेशमी ससीन्द्रन बनाम केरल राज्य और अन्य - केरल उच्च न्यायालय ने एससी/एसटी अधिनियम के तहत मामले में आरोपी को बरी करने से इनकार कर दिया, कहा कि पीड़िता का बयान ही आरोप तय करने के लिए पर्याप्त है।

अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत आरोप तय करने के लिए पीड़िता का बयान ही पर्याप्त है: केरल उच्च न्यायालय

केरल हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े मामले में आरोपी को डिस्चार्ज देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि यदि शिकायतकर्ता का बयान प्रथम दृष्टया अपराध के आवश्यक तत्वों को दर्शाता है, तो केवल इस आधार पर मामला खत्म नहीं किया जा सकता कि अन्य गवाहों के बयान उतने मजबूत नहीं हैं।

यह फैसला जस्टिस ए. बदरुद्दीन ने 13 जनवरी 2026 को सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह आपराधिक अपील एर्नाकुलम स्थित SC/ST (PoA) एक्ट की विशेष अदालत के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। आरोपी रेशमी ससींद्रन ने विशेष अदालत द्वारा उनकी डिस्चार्ज याचिका खारिज किए जाने को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

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मामले के अनुसार, 31 मार्च 2023 को शाम करीब 4 बजे इंफोपार्क फेज-2 के पास एक ऑफिस परिसर में हुई बैठक के दौरान आरोपी ने शिकायतकर्ता को सार्वजनिक रूप से उसकी जाति के नाम से संबोधित कर अपमानित किया। शिकायतकर्ता का आरोप था कि यह घटना अन्य कर्मचारियों की मौजूदगी में हुई, जिससे उसका सार्वजनिक अपमान हुआ।

अदालत की टिप्पणी

अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि दूसरे गवाह के बयान में आरोपी के खिलाफ कोई ठोस आरोप नहीं है और केवल शिकायतकर्ता के बयान के आधार पर मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए।

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हालांकि, अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। जस्टिस बदरुद्दीन ने कहा,

“कानून यह नहीं कहता कि अपराध सिद्ध करने के लिए अनेक गवाहों की आवश्यकता ही हो। यदि एक गवाह का बयान विश्वसनीय है और उससे अपराध के आवश्यक तत्व सामने आते हैं, तो वह पर्याप्त हो सकता है।”

अदालत ने SC/ST (PoA) अधिनियम की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि यदि कोई गैर-SC/ST व्यक्ति किसी SC/ST समुदाय के सदस्य को सार्वजनिक स्थान पर जानबूझकर उसकी जाति के नाम से अपमानित करता है, तो यह अपराध की श्रेणी में आता है।

कोर्ट ने दोहराया कि डिस्चार्ज याचिका पर विचार करते समय अदालत को यह देखना होता है कि अभियोजन रिकॉर्ड से प्रथम दृष्टया अपराध बनता है या नहीं। इस चरण पर गवाहों की विश्वसनीयता का अंतिम मूल्यांकन नहीं किया जाता।

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बेंच ने कहा,

“यदि रिकॉर्ड से कम से कम इतना संकेत मिलता है कि आरोप सही हो सकते हैं और चार्ज फ्रेम करने लायक सामग्री मौजूद है, तो डिस्चार्ज नहीं दिया जा सकता।”

अदालत का फैसला

सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद केरल हाईकोर्ट ने विशेष अदालत के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। अदालत ने माना कि शिकायतकर्ता के बयान से प्रथम दृष्टया SC/ST (PoA) अधिनियम के तहत अपराध बनता है।

अंततः, हाईकोर्ट ने आरोपी द्वारा दायर आपराधिक अपील को खारिज कर दिया और कहा कि मामला ट्रायल के लिए आगे बढ़ेगा।

Case Title:- Reshmi Saseendran v. State of Kerala & Anr.

Case Number:- Criminal Appeal No. 2319 of 2025

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