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SC/ST Act पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी: केवल मौजूदगी से नहीं बनता अपराध, केशव महतो के खिलाफ मुकदमा रद्द

Vivek G.
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केशॉ महतो @ केशॉ कुमार महतो बनाम बिहार राज्य और अन्य - सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के व्यक्ति के खिलाफ एससी/एसटी अधिनियम के तहत दायर मामले को रद्द कर दिया, फैसला सुनाया कि मात्र उपस्थिति और अस्पष्ट आरोप मुकदमे के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

SC/ST Act पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी: केवल मौजूदगी से नहीं बनता अपराध, केशव महतो के खिलाफ मुकदमा रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग और उसके सही दायरे को लेकर एक बार फिर स्पष्ट रुख अपनाया है। बिहार के एक मामले में अदालत ने कहा कि केवल घटना स्थल पर मौजूद होना या सामान्य आरोप, किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे में घसीटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

अदालत ने केशव महतो उर्फ केशव कुमार महतो के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बिहार के भागलपुर जिले से जुड़ा है। आरोप था कि एक आंगनबाड़ी केंद्र पर कुछ लोगों ने प्रथम सूचक के साथ गाली-गलौज की और कथित रूप से जाति से जुड़े शब्द कहे। इस आधार पर IPC की विभिन्न धाराओं और SC/ST एक्ट की धाराओं के तहत FIR दर्ज की गई।

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जांच के बाद चार्जशीट दाखिल हुई और 9 अक्टूबर 2020 को ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए आरोपियों को तलब किया। केशव महतो ने इस आदेश को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन वहां से राहत नहीं मिली। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

अदालत की सुनवाई और अवलोकन

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने राज्य सरकार के वकील से स्पष्ट रूप से पूछा कि केशव महतो के खिलाफ ऐसा कौन सा ठोस साक्ष्य है, जिससे उन पर आरोप तय किए जा सकें।

राज्य की ओर से यह स्वीकार किया गया कि अभियुक्त के खिलाफ कोई विशिष्ट भूमिका या कथित शब्दों का आरोप नहीं है, सिवाय इसके कि वह घटना के समय वहां मौजूद था।

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पीठ ने FIR और चार्जशीट का बारीकी से अध्ययन करते हुए कहा,

“सिर्फ यह तथ्य कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति या जनजाति से है, अपने आप में SC/ST एक्ट की धाराओं को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

SC/ST एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट व्याख्या

अदालत ने दोहराया कि SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के लिए कुछ जरूरी तत्वों का होना अनिवार्य है। इनमें यह दिखना चाहिए कि:

• आरोपी ने जानबूझकर अपमान किया,

• वह अपमान पीड़ित की जाति के कारण था, और

• उसका उद्देश्य जातिगत अपमान या humiliation करना था।

पीठ ने साफ कहा,

“केवल जाति का नाम लेना या सामान्य गाली देना, जब तक वह जातिगत अपमान के इरादे से न हो, अपराध नहीं बनता।”

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सिर्फ SC/ST एक्ट ही नहीं, बल्कि IPC की धाराओं के तहत लगाए गए आरोपों को भी अदालत ने कमजोर पाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि FIR में लगाए गए आरोप सामान्य प्रकृति के हैं और केवल अभियुक्त की मौजूदगी से यह साबित नहीं होता कि उसने अपराध में सक्रिय भूमिका निभाई।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केशव महतो को ट्रायल का सामना करने के लिए मजबूर करना “न्याय का मजाक” होगा।

अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए पटना हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और केशव महतो के खिलाफ पूरी आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया।

Case Title: Keshaw Mahto @ Keshaw Kumar Mahto v. State of Bihar & Anr.

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