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उच्च न्यायालय द्वारा संशोधन के बाद धारा 28-A के तहत भूस्वामियों को द्वितीय पुनर्निर्धारण का अधिकार: सर्वोच्च न्यायालय

Vivek G.
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ज़मीन अधिग्रहण मामलों में हाई कोर्ट के फैसले के आधार पर दूसरी बार मुआवज़ा बढ़ाने की अर्जी भी मान्य है। - अंदनाय्या और अन्य बनाम उप मुख्य अभियंता और अन्य।

उच्च न्यायालय द्वारा संशोधन के बाद धारा 28-A के तहत भूस्वामियों को द्वितीय पुनर्निर्धारण का अधिकार: सर्वोच्च न्यायालय

भारत भर में हजारों भूमि अधिग्रहण मामलों को प्रभावित करने वाले एक महत्वपूर्ण फैसले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि भूस्वामी एक से अधिक बार संशोधित मुआवजे की मांग कर सकते हैं, खासकर तब जब कोई उच्च न्यायालय बाद में राशि बढ़ा देता है।

इस फैसले में यह स्पष्ट किया गया है कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 28-A को कैसे लागू किया जाना चाहिए, जिससे समान स्थिति वाले भूस्वामियों के बीच निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला उन भूमि मालिकों से जुड़ा था जिनकी ज़मीन रेलवे परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई थी। शुरुआत में अधिकारियों ने प्रति एकड़ ₹40,000 मुआवज़ा तय किया था। बाद में रेफरेंस कोर्ट ने इसे बढ़ाकर ₹2,00,000 प्रति एकड़ कर दिया।

कुछ अन्य भूमि मालिकों की अपील पर हाई कोर्ट ने मुआवज़ा और बढ़ाकर ₹3,50,000 प्रति एकड़ कर दिया।

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याचिकाकर्ताओं ने पहले रेफरेंस कोर्ट के आधार पर मुआवज़ा बढ़वाया, लेकिन बाद में हाई कोर्ट के फैसले के आधार पर फिर से मुआवज़ा बढ़ाने की मांग की।

सरकारी अधिकारी ने दूसरी बार दायर आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि:

• एक बार मुआवज़ा स्वीकार करने के बाद दोबारा दावा नहीं किया जा सकता

• कानून के तहत सिर्फ एक ही आवेदन मान्य है

हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने भी इसी तर्क को सही माना और याचिका खारिज कर दी।

जस्टिस एम. एम. सुंदरश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने इस दृष्टिकोण को गलत बताया।

कोर्ट ने कहा:

“कानून का उद्देश्य यह है कि समान स्थिति वाले सभी भूमि मालिकों को समान मुआवज़ा मिले।”

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कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:

• अपीलीय अदालत (High Court या Supreme Court) का फैसला अंतिम माना जाएगा

• निचली अदालत का फैसला उसमें समाहित (merge) हो जाता है

• इसलिए मुआवज़े का पुनर्निर्धारण अंतिम फैसले के आधार पर होना चाहिए

एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कोर्ट ने कहा:

“पहले मुआवज़ा लेने से यह अधिकार समाप्त नहीं होता कि बाद में बढ़े हुए मुआवज़े की मांग की जाए।”

कोर्ट ने “डॉक्ट्रिन ऑफ मर्जर” पर ज़ोर दिया, जिसके अनुसार:

• जब अपीलीय अदालत फैसला देती है, तो वही अंतिम और लागू आदेश होता है

• पहले का आदेश स्वतः उसमें समाहित हो जाता है

इसका मतलब है कि अंतिम मुआवज़ा वही माना जाएगा जो अपीलीय अदालत तय करे।

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सुप्रीम कोर्ट ने:

• हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया

• अधिकारियों द्वारा दूसरी अर्जी खारिज करने का आदेश भी निरस्त किया

• निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं का मुआवज़ा हाई कोर्ट के बढ़े हुए रेट के अनुसार फिर से तय किया जाए

कोर्ट ने यह प्रक्रिया 8 सप्ताह के भीतर पूरी करने का आदेश दिया।

Case Details

Case Title: Andanayya and Ors. vs Deputy Chief Engineer and Ors.

Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (C) Nos. 2587–2593 of 2021

Judge: Justice M. M. Sundresh & Justice N. Kotiswar Singh

Decision Date: March 25, 2026

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