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सुप्रीम कोर्ट: बिना ठोस कारण विभागीय जांच टालकर पुलिसकर्मी को बर्खास्त नहीं किया जा सकता, दिल्ली पुलिस आदेश रद्द

Vivek G.
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सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल मनोहर लाल की बर्खास्तगी रद्द की। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 311(2)(b) के तहत बिना ठोस कारण विभागीय जांच नहीं टाली जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट: बिना ठोस कारण विभागीय जांच टालकर पुलिसकर्मी को बर्खास्त नहीं किया जा सकता, दिल्ली पुलिस आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस के एक कांस्टेबल की सेवा से बर्खास्तगी को अवैध ठहराते हुए महत्वपूर्ण फैसला दिया है। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 311(2)(b) के तहत विभागीय जांच को केवल असाधारण परिस्थितियों में ही टाला जा सकता है।

कोर्ट ने पाया कि मामले में बिना पर्याप्त सामग्री के यह मान लिया गया कि जांच कराना संभव नहीं है, इसलिए पुलिस अधिकारी द्वारा सीधे बर्खास्तगी का आदेश देना उचित नहीं था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल मनोहर लाल की बर्खास्तगी से जुड़ा है। उन्हें 2017 में एक आपराधिक मामले में गिरफ्तारी के बाद सेवा से हटा दिया गया था।

उप पुलिस आयुक्त (DCP) ने 18 जुलाई 2017 को संविधान के अनुच्छेद 311(2)(b) का उपयोग करते हुए बिना विभागीय जांच कराए ही उन्हें बर्खास्त कर दिया। आदेश में कहा गया था कि गवाहों को धमकाने या प्रभावित करने की संभावना है, इसलिए नियमित जांच कराना “व्यावहारिक नहीं” है।

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कांस्टेबल ने इस आदेश को चुनौती देते हुए पहले विभागीय अपील की, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) और फिर दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन दोनों मंचों ने बर्खास्तगी के आदेश को बरकरार रखा।

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

कोर्ट में उठे मुख्य तर्क

अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि संविधान के तहत किसी सरकारी कर्मचारी को बिना विभागीय जांच के बर्खास्त करना केवल दुर्लभ परिस्थितियों में ही संभव है।

उन्होंने कहा कि जिस समय बर्खास्तगी का आदेश दिया गया, उस समय मनोहर लाल न्यायिक हिरासत में थे, इसलिए गवाहों को धमकाने या प्रभावित करने का आरोप आधारहीन है।

वहीं सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि प्रारंभिक जांच में यह आशंका जताई गई थी कि आरोपी पुलिसकर्मी अपने सहयोगियों के जरिए गवाहों को प्रभावित कर सकता है, इसलिए विभाग ने यह कदम उठाया।

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सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां

न्यायमूर्ति जे.के. महेश्वरी की पीठ ने रिकॉर्ड और प्रारंभिक जांच रिपोर्ट का परीक्षण करने के बाद पाया कि उसमें ऐसा कोई ठोस तथ्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि गवाहों को वास्तव में धमकी दी गई थी।

अदालत ने कहा:

“केवल आशंका या अनुमान के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि विभागीय जांच कराना संभव नहीं है। ऐसे मामले में नियमित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 311(2)(b) के तहत जांच को टालने के लिए प्रासंगिक और ठोस कारणों का लिखित रिकॉर्ड होना जरूरी है। केवल एक प्रारंभिक रिपोर्ट में दर्ज अनुमान पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

पीठ ने यह भी ध्यान दिया कि जिस समय बर्खास्तगी का आदेश दिया गया, उस समय आरोपी हिरासत में था। ऐसे में यह दिखाने के लिए कोई सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं थी कि उसने जेल से गवाहों को धमकाया या प्रभावित किया हो।

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न्यायालय का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अनुच्छेद 311(2)(b) का इस्तेमाल बिना उचित आधार के किया गया था।

अदालत ने कहा कि विभागीय जांच को टालने का निर्णय बिना पर्याप्त सामग्री और बिना उचित विचार के लिया गया, इसलिए यह कानून के अनुरूप नहीं है।

परिणामस्वरूप अदालत ने:

• दिल्ली पुलिस द्वारा पारित बर्खास्तगी आदेश रद्द कर दिया।

• केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण और दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश भी निरस्त कर दिए।

• कांस्टेबल को सेवा में पुनः बहाल करने का निर्देश दिया।

हालांकि कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामले को देखते हुए उन्हें बर्खास्तगी से पुनर्नियुक्ति तक की अवधि का केवल 50% वेतन मिलेगा।

Case Title: Manohar Lal v. Commissioner of Police & Ors.

Case No.: Civil Appeal No. 13860 of 2024

Decision Date: 12 March 2026

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