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सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई भारत उद्योग की याचिका, कहा बिना सहमति थोपे गए आर्बिट्रेशन की कोई वैधता नहीं

Shivam
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना सहमति थोपे गए आर्बिट्रेशन की कोई वैधता नहीं, और भारत उद्योग की याचिका खारिज कर दी। - M/S भारत उद्योग लिमिटेड बनाम अंबरनाथ नगर परिषद

सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई भारत उद्योग की याचिका, कहा बिना सहमति थोपे गए आर्बिट्रेशन की कोई वैधता नहीं

नई दिल्ली में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया कि किसी भी पक्ष पर बिना उसकी सहमति के आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता) नहीं थोपी जा सकती। कोर्ट ने भारत उद्योग लिमिटेड की याचिका खारिज करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद महाराष्ट्र के अंबरनाथ नगर परिषद द्वारा 1994 में जारी एक टेंडर से जुड़ा था, जिसमें ऑक्ट्रॉय (नगर कर) संग्रह का ठेका दिया गया था।

भारत उद्योग लिमिटेड ने 6.75 करोड़ रुपये की बोली लगाकर ठेका हासिल किया। लेकिन काम शुरू होने के कुछ ही समय बाद कंपनी ने दावा किया कि तय न्यूनतम बोली (reserve price) ज्यादा है और इसे कम किया जाना चाहिए।

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नगर परिषद ने इस मांग को खारिज कर दिया। इसके बाद कंपनी ने पहले हाई कोर्ट का रुख किया, फिर याचिका वापस लेकर राज्य सरकार से मध्यस्थ नियुक्त करने की मांग की।

राज्य सरकार ने एक आदेश के जरिए कोंकण डिवीजन के कमिश्नर को आर्बिट्रेटर नियुक्त कर दिया, जबकि नगर परिषद ने इस प्रक्रिया पर आपत्ति जताई थी।

आर्बिट्रेटर ने दिसंबर 1994 में फैसला देते हुए न्यूनतम बोली को कम मानते हुए संशोधित कर दिया।

इसके बाद कंपनी ने सिविल कोर्ट में इस अवार्ड को लागू कराने की मांग की। सिविल कोर्ट ने कंपनी के पक्ष में फैसला दिया, लेकिन नगर परिषद ने इसे हाई कोर्ट में चुनौती दी।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने सिविल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि:

• अनुबंध में कोई वैध आर्बिट्रेशन क्लॉज नहीं था

• राज्य सरकार को आर्बिट्रेटर नियुक्त करने का अधिकार नहीं था

• पूरी प्रक्रिया “बैकडोर तरीका” थी

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सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने हाई कोर्ट के निष्कर्षों से सहमति जताई और कहा कि इस मामले में आर्बिट्रेशन का कोई वैध आधार नहीं था।

पीठ ने स्पष्ट कहा,

“पक्षों के बीच ऐसा कोई समझौता नहीं था जो विवाद को आर्बिट्रेशन में भेजने की अनुमति देता हो।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल किसी प्रक्रिया में भाग लेने से अधिकार (jurisdiction) नहीं बन जाता।

“सिर्फ भागीदारी से आर्बिट्रेटर को अधिकार नहीं मिल जाता, खासकर जब मूल रूप से सहमति ही नहीं थी।”

कोर्ट ने राज्य सरकार की भूमिका पर भी सख्त रुख अपनाया।

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पीठ ने कहा कि संबंधित कानून की धारा 143-A(3) के तहत सरकार केवल नीति संबंधी निर्देश दे सकती है, लेकिन वह किसी अनुबंध में जबरन आर्बिट्रेशन लागू नहीं कर सकती।

“सरकार को यह अधिकार नहीं है कि वह पक्षों के बीच पहले से हुए अनुबंध पर आर्बिट्रेशन थोप दे।”

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि:

• कोई वैध आर्बिट्रेशन समझौता नहीं था

• आर्बिट्रेटर की नियुक्ति अधिकार क्षेत्र से बाहर थी

• पूरा आर्बिट्रेशन प्रक्रिया शून्य (void) थी

इन्हीं आधारों पर कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज कर दी और बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

Case Details

Case Title: M/S Bharat Udyog Ltd. vs Ambernath Municipal Council

Case Number: SLP (C) No. 1127 of 2017

Judges: Justice Pamidighantam Sri Narasimha, Justice Alok Aradhe

Decision Date: 24 March 2026

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