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भरण-पोषण विवाद में पति को नहीं मिली राहत, सुप्रीम कोर्ट ने लागत बरकरार रखे

Vivek G.
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सुप्रीम कोर्ट ने भरण-पोषण बकाया मामले में पति की याचिका खारिज कर दी और जुर्माना हटाने से इनकार करते हुए उसकी कार्यवाही को दुरुपयोग बताया। - XXX बनाम YYY

भरण-पोषण विवाद में पति को नहीं मिली राहत, सुप्रीम कोर्ट ने लागत बरकरार रखे

सुप्रीम कोर्ट ने एक लंबे समय से चल रहे वैवाहिक विवाद में भरण-पोषण (maintenance) के भुगतान में लगातार देरी और मुकदमों की बाढ़ पर गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने पति द्वारा दायर याचिका को निराधार बताते हुए उस पर लगाए गए जुर्माने (costs) को हटाने से इनकार कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला पति-पत्नी के बीच लगभग एक दशक से चल रहे विवाद से जुड़ा है। विवाह वर्ष 2010 में हुआ था और 2016 से दोनों अलग रह रहे हैं। दो नाबालिग बच्चे पत्नी के साथ रह रहे हैं।

फैमिली कोर्ट ने 2019 में पति को प्रति माह कुल ₹80,000 भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। साथ ही बच्चों की शिक्षा का खर्च भी वहन करने को कहा गया। हालांकि, रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि पति ने इस आदेश का लगातार पालन नहीं किया, जिससे बकाया राशि बढ़ती गई।

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पत्नी ने बकाया वसूली के लिए कई बार कार्यवाही (execution proceedings) शुरू की, लेकिन मामले में बार-बार देरी होती रही।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पति ने कई मंचों पर 80 से अधिक याचिकाएं और आवेदन दायर किए, जिनमें पत्नी, उसके परिवार और यहां तक कि उसके वकीलों को भी शामिल किया गया।

अदालत ने पहले ही आदेश में इन कार्यवाहियों पर रोक लगाई थी। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पति, जो स्वयं वकील है, अपनी कानूनी जानकारी का उपयोग प्रक्रिया को लंबा खींचने के लिए कर रहा था।

“अदालत ने कहा, ‘ऐसी याचिकाएं न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग हैं और इन्हें प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता।’”

इसके अलावा, पति द्वारा अनुच्छेद 32 के तहत दायर एक रिट याचिका को अदालत ने “तुच्छ और दुर्भावनापूर्ण” करार देते हुए ₹5 लाख का जुर्माना लगाया था।

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पति ने बाद में एक आवेदन (Miscellaneous Application No. 2161 of 2025) दाखिल कर जुर्माने को माफ करने और कोर्ट की टिप्पणियों को हटाने की मांग की।

इस पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि पहले दिए गए आदेश में कोई त्रुटि नहीं है और जुर्माना उचित परिस्थितियों में लगाया गया था।

“पीठ ने स्पष्ट किया, ‘रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों के आधार पर की गई टिप्पणियों को हटाने का कोई औचित्य नहीं बनता।’”

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सुप्रीम कोर्ट ने पति की याचिका को खारिज कर दिया और जुर्माना माफ करने से इनकार कर दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले की गई टिप्पणियां यथावत रहेंगी।

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