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गवाहों को डराने के आरोप वाले मेरठ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की जमानत रद्द की, कहा- हाईकोर्ट ने CCTV और हथियार बरामदगी को नजरअंदाज किया

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सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ फायरिंग मामले में आरोपी की जमानत रद्द करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने CCTV फुटेज, हथियार बरामदगी और गवाहों को धमकाने के आरोपों को नजरअंदाज किया। - मोहसीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य।

गवाहों को डराने के आरोप वाले मेरठ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की जमानत रद्द की, कहा- हाईकोर्ट ने CCTV और हथियार बरामदगी को नजरअंदाज किया

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मेरठ के एक आपराधिक मामले में आरोपी जीशान को दी गई जमानत रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले के महत्वपूर्ण सबूतों, CCTV फुटेज, हथियार बरामदगी और गवाहों को धमकाने के आरोपों पर सही तरीके से विचार नहीं किया।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट का आदेश “कानून की स्पष्ट त्रुटि” से प्रभावित था और रिकॉर्ड पर मौजूद अहम सामग्री को नजरअंदाज करता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला मेरठ के पार्टापुर थाना क्षेत्र में दर्ज FIR संख्या 179/2024 से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, शिकायतकर्ता के भाई की हत्या के मुकदमे में समझौते का दबाव बनाने के लिए आरोपियों ने शिकायतकर्ता के परिवार को निशाना बनाया।

आरोप है कि 12 मई 2024 को आरोपी पक्ष ने शिकायतकर्ता के रिश्तेदारों को रास्ते में रोका, धमकाया और फिर हथियारों के साथ उनके घर तक पहुंचकर हमला किया। FIR में लाठी, डंडा, चाकू और तमंचे के इस्तेमाल का उल्लेख है।

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जांच के दौरान पुलिस को CCTV फुटेज मिली, जिसमें कथित तौर पर जीशान मोटरसाइकिल से आते, घर से तमंचा निकालते और फिर पड़ोसी की छत की ओर जाते दिखाई दिया। इसके बाद गोली चलने जैसी आवाजें रिकॉर्ड हुईं।

अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, कई प्रत्यक्षदर्शियों ने बयान दिया कि जीशान ने जान से मारने की नीयत से फायरिंग की, हालांकि किसी को गोली नहीं लगी।

जीशान को पहले अक्टूबर 2024 में इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिली थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2025 में वह राहत रद्द कर दी थी और कहा था कि हाईकोर्ट ने आरोपी की भूमिका को गलत तरीके से “सामान्य और अस्पष्ट” बताया।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी आरोपी ने तुरंत आत्मसमर्पण नहीं किया। ट्रायल कोर्ट को गैर-जमानती वारंट जारी करना पड़ा और बाद में धारा 82 CrPC की कार्रवाई भी शुरू की गई। आरोपी करीब 42 दिन बाद अदालत के सामने पेश हुआ।

इसके बावजूद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सितंबर 2025 में दोबारा जमानत दे दी। हाईकोर्ट ने FIR दर्ज करने में सात घंटे की देरी, गोली का घाव न होना और सह-आरोपी को मिली जमानत को आधार बनाया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने पहले जमानत रद्द करने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर कोई विचार नहीं किया।

पीठ ने कहा,

“हाईकोर्ट के आदेश में उन कारणों पर कोई चर्चा नहीं है जिनके आधार पर इस अदालत ने पहले जमानत रद्द की थी।”

अदालत ने यह दलील भी खारिज कर दी कि समीक्षा याचिका लंबित होने के कारण आरोपी ने आत्मसमर्पण में देरी की।

पीठ ने कहा,

“रिव्यू पिटीशन दायर करने से मूल आदेश पर स्वतः रोक नहीं लगती।”

गोली लगने की चोट न होने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति ने हत्या की नीयत से फायरिंग की हो, तो केवल गोली न लगना धारा 307 IPC के आरोप को खत्म नहीं करता।

अदालत ने यह भी कहा कि सह-आरोपी के साथ समानता का सिद्धांत हर मामले में स्वतः लागू नहीं किया जा सकता, खासकर जब आरोप और सबूत अलग हों।

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट का 22 सितंबर 2025 का जमानत आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने आरोपी जीशान को तुरंत ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

साथ ही कहा कि यदि वह पेश नहीं होता है, तो ट्रायल कोर्ट गैर-जमानती वारंट सहित आवश्यक कार्रवाई कर सकता है।

Case Details

Case Title: Mohseen v. State of Uttar Pradesh & Anr.

Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 16696 of 2025

Judges: Justice Sanjay Karol and Justice Nongmeikapam Kotiswar Singh

Decision Date: May 22, 2026

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