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HUDA फ्लैट घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: पक्षपात पर रद्द हुआ अलॉटमेंट, अफसरों पर जुर्माना

Vivek G.
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दिनेश कुमार बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने HUDA कर्मचारी सोसाइटी के फ्लैट अलॉटमेंट में पक्षपात पाया, हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दोबारा ड्रॉ के आदेश दिए।

HUDA फ्लैट घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: पक्षपात पर रद्द हुआ अलॉटमेंट, अफसरों पर जुर्माना

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की अदालत में सुनवाई के दौरान माहौल गंभीर था। मामला दो “सुपर डीलक्स” फ्लैटों के अलॉटमेंट से जुड़ा था। याचिकाकर्ता दिनेश कुमार ने आरोप लगाया कि हरियाणा की एक कर्मचारी कल्याण सोसाइटी ने नियमों को दरकिनार कर अपने ही पदाधिकारियों को फायदा पहुंचाया।

मामला था सुप्रीम कोर्ट में दायर अपील का, जिसमें HUDA से जुड़े कर्मचारियों की सोसाइटी - HEWO - के फैसलों को चुनौती दी गई थी।

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मामले की पृष्ठभूमि

HEWO, यानी HUDA अर्बन एस्टेट और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एम्प्लॉइज वेलफेयर ऑर्गेनाइजेशन, एक रजिस्टर्ड सोसाइटी है। इसका उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों को आवास सुविधा उपलब्ध कराना है।

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याचिकाकर्ता दिनेश कुमार, जो 14 साल से अधिक समय तक HUDA में प्रतिनियुक्ति पर रहे, ने आरोप लगाया कि दो सुपर डीलक्स फ्लैटों का अलॉटमेंट नियमों के खिलाफ किया गया।

पहला फ्लैट एक गवर्निंग बॉडी सदस्य (तीसरे प्रतिवादी) को “प्राथमिकता” के आधार पर दिया गया। दूसरा फ्लैट ड्रॉ ऑफ लॉट्स में चौथे प्रतिवादी को मिला। दिनेश कुमार ने इसे खुला पक्षपात बताया।

हाईकोर्ट का रुख

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने माना कि ड्रॉ में भाग लेने के बाद याचिकाकर्ता चुनौती नहीं दे सकते।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस निष्कर्ष को “सरसरी” बताया। अदालत ने कहा कि जब पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो न्यायिक समीक्षा संभव है।

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सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने स्पष्ट कहा, “नेपोटिज़्म (भाई-भतीजावाद) और आत्म-प्रचार लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक हैं।”

कोर्ट ने पाया कि तीसरे प्रतिवादी ने आवेदन की अंतिम तिथि के बाद पद संभाला था। उस समय वे न तो HUDA में कर्मचारी थे और न ही छह महीने की अनिवार्य सेवा अवधि पूरी करते थे।

फैसले में कहा गया, “यह स्पष्ट रूप से पक्षपात और आत्म-प्रशंसा का प्रदर्शन है।”

अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि तीसरे प्रतिवादी ने अपने आधिकारिक पद से खुद को ही पत्र लिखकर फीस जमा करने को कहा। इसे कोर्ट ने “complete farce” यानी पूरी तरह से दिखावा बताया ।

चौथे प्रतिवादी पर भी सवाल

चौथे प्रतिवादी के मामले में कोर्ट ने पाया कि वे निर्धारित पे-बैंड स्तर में नहीं आते थे। बाद में गवर्निंग बॉडी ने एक बैठक में अपवाद बनाकर ड्रॉ को “रेगुलराइज” कर दिया।

कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि नियमों में कहीं यह शर्त नहीं थी कि ड्रॉ के लिए न्यूनतम आवेदकों की संख्या जरूरी है।

साथ ही आवेदन पत्र पर तारीख और डिमांड ड्राफ्ट का विवरण न होने पर भी कोर्ट ने संदेह जताया।

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अदालत का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया। दोनों फ्लैटों का अलॉटमेंट निरस्त कर दिया गया।

कोर्ट ने HEWO पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। तीसरे प्रतिवादी पर 50,000 रुपये और चौथे पर 25,000 रुपये का दंड लगाया गया।

HEWO को निर्देश दिया गया कि:

• तीसरे और चौथे प्रतिवादी को जमा राशि एक महीने में बिना ब्याज लौटाई जाए।

• दोनों एक महीने के भीतर फ्लैट खाली करें।

• चार पात्र आवेदकों के बीच दोबारा ड्रॉ कराया जाए।

• यदि केवल एक आवेदक बचता है, तो एक फ्लैट याचिकाकर्ता को दिया जाए और उन्हें छह महीने का भुगतान समय मिले।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सोसाइटी अपने गवर्निंग बॉडी सदस्यों से लागत वसूल सकती है।

अंत में अदालत ने कहा, “गवर्निंग बॉडी के सदस्य, भले ही वे पदेन हों, सार्वजनिक हित और पारदर्शिता से समझौता नहीं कर सकते।”

अपील स्वीकार की गई और मामले का निपटारा कर दिया गया।

Case Title: Dinesh Kumar vs The State of Haryana & Ors.

Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 16057 of 2025

Decision Date: February 17, 2026

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