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लाइसेंस विवाद में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: स्मॉल कॉज़ कोर्ट की दलील खारिज, मध्यस्थता जारी रखने को हरी झंडी

Vivek G.
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मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड बनाम संतोष कोर्डेइरो और अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने लाइसेंस विवाद में कहा कि स्मॉल कॉज़ कोर्ट का अधिकार मध्यस्थता को खत्म नहीं करता। Motilal Oswal केस में अहम फैसला।

लाइसेंस विवाद में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: स्मॉल कॉज़ कोर्ट की दलील खारिज, मध्यस्थता जारी रखने को हरी झंडी

नई दिल्ली में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम सवाल पर स्पष्ट रुख अपनाया-क्या लाइसेंसर-लाइसेंसी विवाद में मध्यस्थता (Arbitration) अपने-आप खत्म हो जाती है, अगर स्मॉल कॉज़ कोर्ट को विशेष अधिकार दिए गए हों? अदालत ने कहा कि केवल अधिकार क्षेत्र का उल्लेख होने से मध्यस्थता समझौता निष्प्रभावी नहीं हो जाता।

यह फैसला Motilal Oswal Financial Services Limited बनाम Santosh Cordeiro मामले में आया, जहां बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी।

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मामले की पृष्ठभूमि

मामला मुंबई के मलाड (पश्चिम) स्थित एक व्यावसायिक परिसर से जुड़ा है। अक्टूबर 2017 में पक्षकारों के बीच लीव एंड लाइसेंस एग्रीमेंट हुआ था। कोविड-19 महामारी के दौरान लाइसेंसी ने फोर्स मेजर का हवाला देते हुए परिसर खाली कर दिया और सिक्योरिटी डिपॉज़िट की वापसी मांगी।

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इसके उलट, लाइसेंसर ने शेष लॉक-इन अवधि के लिए लाइसेंस फीस की मांग करते हुए मध्यस्थता क्लॉज को सक्रिय किया। विवाद यहीं से गहराया।

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने मध्यस्थ नियुक्त करने का आदेश दिया था। कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि Presidency Small Cause Courts Act, 1882 की धारा 41 के कारण यह विवाद मध्यस्थता के दायरे में नहीं आता और केवल स्मॉल कॉज़ कोर्ट ही सुनवाई कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

दो-न्यायाधीशों की पीठ ने साफ कहा कि Section 11(6-A) के तहत अदालत का काम सिर्फ यह देखना है कि क्या मध्यस्थता समझौता अस्तित्व में है या नहीं।

पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा,

“इस स्तर पर अदालत को गहन जांच नहीं करनी है। केवल यह देखना है कि पक्षकारों के बीच मध्यस्थता समझौता मौजूद है या नहीं।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विशेष अदालत को अधिकार दिए जाने मात्र से मध्यस्थता क्लॉज स्वतः निष्प्रभावी नहीं हो जाता।

कानूनी विश्लेषण

कोर्ट ने पुराने फैसलों और हालिया संविधान पीठ के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि मध्यस्थता कानून अपने-आप में एक संपूर्ण व्यवस्था है। जहां समझौते में मध्यस्थता का स्पष्ट प्रावधान है, वहां प्रारंभिक चरण में गैर-मध्यस्थता का सवाल नहीं उठाया जा सकता।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि यह तय करना कि दावा “लाइसेंस फीस” है या “कर्ज/देय राशि”, मध्यस्थ के अधिकार क्षेत्र में आता है।

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अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने निर्देश दिया कि मध्यस्थता की कार्यवाही जारी रहे और छह महीने के भीतर पूरी की जाए।

यहीं पर कोर्ट ने साफ किया कि इस चरण पर अन्य सभी कानूनी प्रश्न खुले रहेंगे, जिन्हें उपयुक्त मंच पर तय किया जा सकता है।

Case Title: Motilal Oswal Financial Services Ltd. vs Santosh Cordeiro & Anr.

Case No.: Civil Appeal No. 36 of 2026

Case Type: Arbitration – Commercial Dispute

Decision Date: 5 January 2026

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