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दहेज मृत्यु मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त: बिना ठोस कारण जमानत देने पर पटना हाईकोर्ट को फटकार, आरोपी को सरेंडर का आदेश

Shivam
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सुप्रीम कोर्ट ने दहेज मृत्यु मामले में हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत रद्द करते हुए आरोपी को सरेंडर करने का आदेश दिया, गंभीरता से विचार न करने पर नाराजगी जताई। - लाल मुनि देवी बनाम बिहार राज्य और अन्य।

दहेज मृत्यु मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त: बिना ठोस कारण जमानत देने पर पटना हाईकोर्ट को फटकार, आरोपी को सरेंडर का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज मृत्यु के एक गंभीर मामले में पटना हाईकोर्ट द्वारा आरोपी पति को दी गई जमानत को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि ऐसे मामलों में जमानत देते समय अदालतों को अत्यधिक सतर्क रहना चाहिए और सभी तथ्यों पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बिहार का है, जहां मृतका की मां ने आरोप लगाया कि उसकी बेटी की शादी के डेढ़ साल के भीतर ही संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। शिकायत के अनुसार, शादी के बाद दहेज की मांग को लेकर लगातार उत्पीड़न किया जा रहा था।

एफआईआर में कहा गया कि आरोपी पति और उसके परिवार ने मोटरसाइकिल, फ्रिज और अन्य वस्तुओं की मांग की। मांग पूरी न होने पर मृतका को प्रताड़ित किया गया।

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पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सिर, छाती और शरीर के अन्य हिस्सों पर गंभीर चोटें पाई गईं, जिससे मौत का कारण ‘हेड इंजरी के कारण शॉक और रक्तस्राव’ बताया गया।

सेशन कोर्ट और पहले चरण में हाईकोर्ट ने आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। लेकिन बाद में हाईकोर्ट ने यह कहते हुए जमानत दे दी कि आरोपी लंबे समय से हिरासत में है और ट्रायल में देरी हो रही है।

इस आदेश को मृतका की मां ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश को “असमर्थनीय” बताया। अदालत ने कहा:

“इतने गंभीर अपराध में हाईकोर्ट को अपने विवेक का प्रयोग अत्यधिक सावधानी से करना चाहिए था।”

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कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट और गंभीर चोटों जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों पर विचार नहीं किया।

पीठ ने यह चिंता भी जताई कि दहेज मृत्यु के मामलों में जमानत देने में “यांत्रिक दृष्टिकोण” अपनाया जा रहा है, जो न्याय प्रणाली के प्रति लोगों के विश्वास को कमजोर कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत देते समय अपराध की प्रकृति, आरोपों की गंभीरता, साक्ष्यों की स्थिति और समाज पर प्रभाव जैसे कारकों पर विचार करना अनिवार्य है।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि जमानत आदेश बिना पर्याप्त कारण के दिया गया हो, तो उच्च न्यायालय उसे रद्द कर सकता है।

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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत को रद्द करते हुए आरोपी को एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

अदालत ने यह भी आदेश दिया कि यदि आरोपी निर्धारित समय में सरेंडर नहीं करता है, तो ट्रायल कोर्ट उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी करे।

साथ ही, ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि मामले का निपटारा छह महीने के भीतर किया जाए।

Case Details

Case Title: Lal Muni Devi vs State of Bihar & Anr.

Case Number: Criminal Appeal No. 1626/2026 (arising out of SLP (Crl.) No. 4402/2026)

Judge: Justice J.B. Pardiwala & Justice Vijay Bishnoi

Decision Date: 25 March 2026

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