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सुप्रीम कोर्ट: रिश्वत मामले में आयकर निरीक्षक दोषी, हाईकोर्ट का बरी करने का आदेश आंशिक रूप से पलटा

Vivek G.
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केंद्रीय जांच ब्यूरो बनाम बलजीत सिंह, सुप्रीम कोर्ट ने CBI बनाम बलजीत सिंह रिश्वत मामले में बड़ा फैसला देते हुए आयकर निरीक्षक की दोषसिद्धि बहाल की और सजा घटाकर एक साल कर दी।

सुप्रीम कोर्ट: रिश्वत मामले में आयकर निरीक्षक दोषी, हाईकोर्ट का बरी करने का आदेश आंशिक रूप से पलटा

सुप्रीम कोर्ट ने रिश्वतखोरी के एक पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आयकर विभाग के एक निरीक्षक की सजा बहाल कर दी है। अदालत ने कहा कि भले ही साजिश का आरोप साबित नहीं हुआ, लेकिन रिश्वत मांगने और स्वीकार करने के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं।

मामला CBI की अपील से जुड़ा था, जिसमें हाईकोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई थी। अदालत ने निरीक्षक बलजीत सिंह के खिलाफ दोष सिद्ध माना, लेकिन उसकी सजा चार साल से घटाकर एक साल कर दी।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 2010 में आयकर आकलन से जुड़ा है। शिकायतकर्ता एक फर्म का साझेदार था, जिसकी आयकर जांच चल रही थी। उस समय संबंधित फर्म का आकलन अधिकारी आयकर विभाग का संयुक्त आयुक्त था और बलजीत सिंह उसी विभाग में निरीक्षक के पद पर कार्यरत था।

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शिकायतकर्ता के अनुसार, दिसंबर 2010 में आयकर कार्यालय में हुई मुलाकात के बाद निरीक्षक बलजीत सिंह ने कथित तौर पर ₹5 लाख की रिश्वत मांगी। आरोप था कि यह रकम आकलन प्रक्रिया को बिना किसी परेशानी के पूरा कराने के बदले मांगी गई थी।

शिकायतकर्ता ने इसकी शिकायत सीबीआई से की, जिसके बाद एजेंसी ने जाल बिछाने की कार्रवाई शुरू की।

CBI का ट्रैप ऑपरेशन

सीबीआई अधिकारियों ने शिकायत की पुष्टि के बाद दो स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में ट्रैप की योजना बनाई।

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शिकायतकर्ता को ₹2 लाख की रकम दी गई, जिन नोटों पर विशेष रासायनिक पाउडर लगाया गया था। इसके बाद शिकायतकर्ता आयकर कार्यालय पहुंचा और कथित तौर पर यह रकम आरोपी निरीक्षक को सौंप दी।

कुछ ही क्षण बाद सीबीआई टीम ने आरोपी को पकड़ लिया। तलाशी के दौरान वही लिफाफा उसके कोट की जेब से बरामद हुआ जिसमें चिन्हित नोट रखे गए थे।

अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपी के हाथ और कपड़ों को रासायनिक घोल में धोने पर घोल गुलाबी हो गया, जिससे संकेत मिला कि उसने उन नोटों को छुआ था।

ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट का फैसला

ट्रायल कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद आरोपी निरीक्षक और संयुक्त आयुक्त दोनों को दोषी ठहराया था। अदालत ने उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 120B (आपराधिक साजिश) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत चार साल की कठोर कैद और ₹1 लाख जुर्माने की सजा सुनाई थी।

हालांकि बाद में हाईकोर्ट ने सबूतों को पर्याप्त न मानते हुए दोनों आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि साजिश और रिश्वत मांगने के आरोप स्पष्ट रूप से साबित नहीं हुए।

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों का विस्तृत परीक्षण किया।

अदालत ने माना कि संयुक्त आयुक्त के खिलाफ रिश्वत मांगने या स्वीकार करने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। इसलिए उनके खिलाफ आरोप सिद्ध नहीं होते।

लेकिन निरीक्षक बलजीत सिंह के मामले में अदालत ने अलग निष्कर्ष निकाला।

पीठ ने कहा,

“शिकायतकर्ता ने स्पष्ट रूप से बताया कि 27 दिसंबर 2010 को आरोपी ने रिश्वत की मांग की थी और बाद में ट्रैप के दौरान वह रकम स्वीकार करते हुए पकड़ा गया।”

अदालत ने यह भी कहा कि ट्रैप की प्रक्रिया, बरामदगी और रासायनिक परीक्षण जैसे तथ्य गवाहों के बयानों से पुष्ट होते हैं।

साजिश का आरोप साबित नहीं

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों अधिकारियों के बीच किसी आपराधिक साजिश का पर्याप्त प्रमाण नहीं मिला।

पीठ ने कहा कि केवल यह तथ्य कि एक अधिकारी आकलन अधिकारी था और दूसरा उसका अधीनस्थ, इससे अपने-आप साजिश साबित नहीं होती।

अदालत ने कहा,

“रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि दोनों आरोपियों के बीच पहले से कोई आपराधिक योजना बनी थी।”

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अदालत का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को आंशिक रूप से पलटते हुए निरीक्षक बलजीत सिंह की दोषसिद्धि बहाल कर दी।

हालांकि अदालत ने उसकी सजा में राहत देते हुए चार साल की कठोर कैद को घटाकर एक साल कर दिया। साथ ही ₹1 लाख का जुर्माना बरकरार रखा गया।

अदालत ने आरोपी को चार सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

Case Title: Central Bureau of Investigation vs Baljeet Singh

Case No.: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No.12486 of 2025

Decision Date: 10 March 2026

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