Logo

सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे बनाम L&T मामले में बड़ा फैसला, प्री-अवार्ड ब्याज रद्द, पोस्ट-अवार्ड घटाकर 8% किया

Vivek G.
Add Court Book as a preferred source on Google

भारत संघ एवं अन्य बनाम लार्सन एंड टूब्रो लिमिटेड, सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे बनाम L&T मध्यस्थता विवाद में प्री-अवार्ड ब्याज रद्द किया और पोस्ट-अवार्ड ब्याज 12% से घटाकर 8% किया।

सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे बनाम L&T मामले में बड़ा फैसला, प्री-अवार्ड ब्याज रद्द, पोस्ट-अवार्ड घटाकर 8% किया

दिल्ली की ठंडी सुबह में सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने एक अहम मध्यस्थता (Arbitration) विवाद पर फैसला सुनाया। मामला था केंद्र सरकार और नॉर्थ सेंट्रल रेलवे बनाम लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड (L&T) का। अदालत ने साफ किया कि अगर अनुबंध में ब्याज पर रोक है, तो मध्यस्थ (Arbitrator) उसे नजरअंदाज नहीं कर सकता।

पीठ में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल थे। फैसला 27 फरवरी 2026 को सुनाया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद 2011 के एक बड़े रेलवे अनुबंध से जुड़ा था। यह ठेका झांसी वर्कशॉप के आधुनिकीकरण के लिए दिया गया था, जिसकी कीमत करीब 93 करोड़ रुपये थी। काम पूरा करने की मूल समय-सीमा 18 महीने थी, लेकिन इसमें करीब 40 महीने की देरी हुई।

Read also:-रूह अफजा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: यूपी में 12.5% नहीं, 4% VAT लगेगा फल पेय के रूप में

Court Book subscription: bare acts, legal drafts, court judgments and ad-free legal news, plans from ₹30/month

देरी और भुगतान में विलंब को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बढ़े। मामला मध्यस्थता के लिए गया और 25 दिसंबर 2018 को आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने L&T के पक्ष में करीब 5.53 करोड़ रुपये का अवार्ड दिया। साथ ही, कुछ दावों पर ब्याज भी जोड़ा गया।

रेलवे ने इस अवार्ड को पहले कमर्शियल कोर्ट, फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन राहत नहीं मिली। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि अनुबंध की सामान्य शर्तों (GCC) में साफ लिखा है कि “ठेके के तहत देय राशि पर कोई ब्याज नहीं दिया जाएगा।”

दूसरी ओर, L&T की तरफ से कहा गया कि यह रोक सीमित है और सभी भुगतान पर लागू नहीं होती। उनका तर्क था कि कुछ रकम “स्वीकृत देनदारी” थी, इसलिए उस पर ब्याज मिलना चाहिए।

न्यायालय का अवलोकन

पीठ ने अनुबंध की धारा 16(3) और 64(5) को विस्तार से पढ़ा। अदालत ने कहा कि 1996 के मध्यस्थता कानून (Arbitration and Conciliation Act, 1996) की धारा 31(7)(a) साफ कहती है कि यदि पक्षकारों ने ब्याज पर रोक लगाई है, तो मध्यस्थ उस पर ब्याज नहीं दे सकता।

Read also:-40 साल पुराने दोहरे हत्याकांड में दोषियों को राहत नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद बरकरार रखी

बेंच ने कहा, “जब अनुबंध स्पष्ट रूप से ब्याज को प्रतिबंधित करता है, तब ट्रिब्यूनल उसे ‘मुआवज़ा’ कहकर भी नहीं दे सकता।”

अदालत ने माना कि ट्रिब्यूनल ने क्लेम नंबर 1, 3 और 6 में जो प्री-अवार्ड या पेंडेंटे लाइट ब्याज दिया, वह अनुबंध के खिलाफ था। इसलिए वह हिस्सा रद्द किया गया।

Post-Award Interest पर क्या कहा?

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पोस्ट-अवार्ड ब्याज (यानी फैसला आने के बाद भुगतान में देरी पर ब्याज) अलग श्रेणी में आता है।

पीठ ने कहा, “धारा 31(7)(b) के तहत पोस्ट-अवार्ड ब्याज कानून से मिलता है, जब तक कि अनुबंध में उसे स्पष्ट रूप से न रोका गया हो।”

इस मामले में अनुबंध में पोस्ट-अवार्ड ब्याज पर साफ रोक नहीं थी। इसलिए अदालत ने सिद्धांत रूप से इसे सही माना।

लेकिन, ट्रिब्यूनल ने 12% सालाना ब्याज तय किया था। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए यह दर अधिक है। बिना ठोस कारण बताए 12% तय करना उचित नहीं था।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने पोस्ट-अवार्ड ब्याज को 12% से घटाकर 8% सालाना कर दिया।

Read also:-सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कोयला ब्लॉक रद्द होने को ‘कानून में बदलाव’ माना, मुआवज़ा बरकरार

फ़ैसला

अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और कमर्शियल कोर्ट के आदेशों को आंशिक रूप से रद्द कर दिया।

प्री-अवार्ड/पेंडेंटे लाइट ब्याज से संबंधित हिस्सा निरस्त किया गया।

पोस्ट-अवार्ड ब्याज को 12% से घटाकर 8% किया गया।

इस तरह, अपील आंशिक रूप से स्वीकार की गई।

Case Title: Union of India & Ors. v. Larsen & Toubro Limited

Case No.: Special Leave Petition (Civil) No. 14989 of 2023 (Civil Appeal of 2026)

Decision Date: 27 February 2026

Download Judgment

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Get it on Google PlayDownload on the App Store
Join the Court Book WhatsApp channel for latest judgments, notifications, legal news and exam updates