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मोटर दुर्घटना मुआवज़े से ग्रुप इंश्योरेंस राशि नहीं घटेगी: सुप्रीम कोर्ट

Shivam
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सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि नियोक्ता द्वारा प्रदान की गई समूह बीमा से प्राप्त मुआवजे को मोटर वाहन अधिनियम के तहत मोटर दुर्घटना मुआवजे से नहीं घटाया जा सकता है। - प्रबंध निदेशक, केएसआरटीसी बनाम पी. चंद्रमौली और अन्य।

मोटर दुर्घटना मुआवज़े से ग्रुप इंश्योरेंस राशि नहीं घटेगी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवज़े से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि मृतक कर्मचारी के परिवार को नियोक्ता की ग्रुप इंश्योरेंस योजना से मिली राशि को मोटर वाहन अधिनियम के तहत दिए जाने वाले मुआवज़े से घटाया नहीं जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे लाभ एक अलग संविदात्मक संबंध से उत्पन्न होते हैं और इन्हें “pecuniary advantage” मानकर कटौती नहीं की जा सकती।

यह फैसला KSRTC बनाम पी. चंद्रमौली व अन्य सहित दो अपीलों में सुनाया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

पहला मामला वर्ष 2018 की सड़क दुर्घटना से जुड़ा था। मृतक पी. विश्वेश्वर मोटरसाइकिल से जा रहे थे, तभी एक KSRTC बस ने गलत दिशा में आकर उनकी बाइक को टक्कर मार दी। गंभीर चोटों के कारण उनकी मृत्यु हो गई।

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परिवार ने मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 166 के तहत ₹1 करोड़ मुआवज़े की मांग की थी।

मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) ने बस चालक को दोषी मानते हुए ₹69,07,710 मुआवज़ा तय किया, लेकिन इसमें से लगभग ₹35.48 लाख की कटौती कर दी क्योंकि परिवार को कर्मचारी ग्रुप इंश्योरेंस से राशि मिली थी।

बाद में कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह कटौती हटाते हुए पूरी राशि देने का आदेश दिया।

दूसरा मामला 2015 की दुर्घटना से जुड़ा था जिसमें सेलेस्टीन डी’सूजा की बस की टक्कर से मौत हो गई थी। इस मामले में भी ट्रिब्यूनल ने ग्रुप इंश्योरेंस राशि घटाई थी, जिसे हाईकोर्ट ने हटाते हुए मुआवज़ा पुनः निर्धारित किया।

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सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि जब परिवार को पहले ही ग्रुप इंश्योरेंस से धन मिल चुका है, तो वही राशि मोटर दुर्घटना मुआवज़े से घटाई जानी चाहिए।

उनका यह भी कहना था कि अन्यथा दावा करने वालों को एक ही दुर्घटना से दोहरा लाभ मिलेगा।

दूसरी ओर, पीड़ित पक्ष ने कहा कि ग्रुप इंश्योरेंस और मोटर वाहन अधिनियम के तहत मिलने वाला मुआवज़ा दो अलग स्रोतों से मिलने वाले लाभ हैं, इसलिए इन्हें एक-दूसरे से समायोजित नहीं किया जा सकता।

इसे तकनीकी आधारों पर कम नहीं किया जा सकता।

अदालत ने Helen C. Rebello बनाम MSRTC, United India Insurance Co. बनाम Patricia Jean Mahajan और Sebastiani Lakra बनाम National Insurance Co. जैसे पूर्व निर्णयों का हवाला दिया।

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कोर्ट ने कहा:

“नियोक्ता द्वारा प्रदान की गई ग्रुप इंश्योरेंस या अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ एक स्वतंत्र संविदात्मक संबंध से उत्पन्न होते हैं और इन्हें मोटर दुर्घटना मुआवज़े से घटाया नहीं जा सकता।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मुआवज़े का उद्देश्य पीड़ित परिवार को “just compensation” देना है।

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए दोनों अपीलों को खारिज कर दिया।

अदालत ने कहा कि ट्रिब्यूनल द्वारा ग्रुप इंश्योरेंस राशि की कटौती करना कानून के अनुरूप नहीं था।

साथ ही निर्देश दिया कि यदि अभी तक मुआवज़े की राशि जमा नहीं हुई है तो संबंधित पक्ष छह सप्ताह के भीतर उसे जमा करें।

Case Title: The Managing Director, KSRTC v. P. Chandramouli & Ors.

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