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NDPS Act की धारा 50 के उल्लंघन पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की अपील खारिज की

Shivam
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि NDPS Act की धारा 50 का पालन न होने पर तलाशी और बरामदगी संदेहास्पद हो जाती है। इसी आधार पर आरोपी की बरी को बरकरार रखा गया। - हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम सूरत सिंह

NDPS Act की धारा 50 के उल्लंघन पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की अपील खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने NDPS Act के तहत दर्ज एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी की बरी को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि तलाशी के दौरान कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है और धारा 50 के उल्लंघन से पूरी कार्रवाई अवैध हो सकती है।

न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम सूरत सिंह मामले में राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए कहा कि हाई कोर्ट का फैसला सही था और उसमें हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला 13 मार्च 2013 का है जब हिमाचल प्रदेश पुलिस की टीम नाकाबंदी के दौरान एक व्यक्ति को बैग के साथ आते देख संदेह के आधार पर पकड़ती है। पुलिस ने बैग की तलाशी लेने पर उसमें से लगभग 11 किलो 50 ग्राम चरस बरामद होने का दावा किया।

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जांच के बाद आरोपी के खिलाफ NDPS Act की धारा 20 के तहत मामला दर्ज किया गया। ट्रायल कोर्ट ने सबूतों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष की सजा और ₹1 लाख का जुर्माना लगाया।

हालांकि, बाद में आरोपी ने इस फैसले को हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट में चुनौती दी।

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि चरस आरोपी के बैग से बरामद हुई थी और पुलिस की कार्रवाई विधिसम्मत थी। अभियोजन पक्ष ने कहा कि यह बरामदगी एक चांस रिकवरी थी क्योंकि पुलिस को पहले से कोई सूचना नहीं थी।

सरकार ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला सबूतों के आधार पर सही था और हाई कोर्ट ने इसे गलत तरीके से पलट दिया।

वहीं आरोपी की ओर से तर्क दिया गया कि तलाशी के समय NDPS Act की धारा 50 का सही तरीके से पालन नहीं किया गया। आरोपी को केवल यह बताया गया कि वह मजिस्ट्रेट या गजेटेड अधिकारी के सामने तलाशी दे सकता है, लेकिन साथ ही पुलिस अधिकारी के सामने तलाशी देने का तीसरा विकल्प भी दिया गया, जो कानून के विरुद्ध है।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि NDPS Act की धारा 50 के अनुसार आरोपी को स्पष्ट रूप से यह अधिकार बताया जाना चाहिए कि वह अपनी तलाशी मजिस्ट्रेट या गजेटेड अधिकारी के सामने करवा सकता है।

अदालत ने कहा:

“कानून केवल दो विकल्प देता है-मजिस्ट्रेट या गजेटेड अधिकारी के सामने तलाशी। पुलिस अधिकारी के सामने तलाशी का तीसरा विकल्प देना कानून के प्रावधानों के विपरीत है।”

पीठ ने यह भी नोट किया कि यदि तलाशी की प्रक्रिया पर ही संदेह उत्पन्न हो जाए तो बरामदगी की वैधता भी संदिग्ध हो जाती है।

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इसके अलावा अदालत ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास का भी उल्लेख किया। एक गवाह ने कहा कि उसके पास इलेक्ट्रॉनिक तराजू नहीं था, जबकि पुलिस ने दावा किया था कि उसी से चरस का वजन किया गया था। इससे अभियोजन की कहानी और कमजोर हो गई।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने सबूतों का सही मूल्यांकन किया है और आरोपी की बरी में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि बरी के आदेश के खिलाफ अपील में हस्तक्षेप तभी किया जा सकता है जब निचली अदालत का फैसला पूरी तरह असंगत या अवैध हो।

इन कारणों से सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार की अपील को खारिज कर दिया और आरोपी की बरी को बरकरार रखा।

Case Title: State of Himachal Pradesh vs Surat Singh

Case Number: Criminal Appeal No. 96 of 2018

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