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सुप्रीम कोर्ट ने भूमि मुआवजा बहाल किया, कहा– कुछ मामलों की वजह से पूरी अवॉर्ड रद्द नहीं हो सकती

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सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे भूमि अधिग्रहण केस में मुआवजा बहाल किया, कहा कुछ पर आरोप से पूरी अवॉर्ड रद्द नहीं हो सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने भूमि मुआवजा बहाल किया, कहा– कुछ मामलों की वजह से पूरी अवॉर्ड रद्द नहीं हो सकती

सर्वोच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ में रेलवे परियोजना के लिए अधिग्रहित भूमि से जुड़े मामले में एक भूमि स्वामी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उसका मूल और बढ़ाया गया मुआवजा बहाल कर दिया।

यह मामला निरज जैन नामक ज़मींदार से जुड़ा है, जिनका मुआवजा केवल इस आधार पर रद्द कर दिया गया था कि कुछ अन्य भूमि मालिकों को कथित तौर पर बाजार मूल्य से अधिक भुगतान किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस कार्रवाई को गलत ठहराते हुए राहत दी

वर्ष 2017 में छत्तीसगढ़ में एक विशेष रेलवे परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण किया गया था। इसके तहत फरवरी 2018 में सक्षम प्राधिकारी ने मुआवजे का अवॉर्ड पारित किया।

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कुछ भूमि मालिकों ने मुआवजा बढ़ाने के लिए मध्यस्थ (Arbitrator) का रुख किया, जहां उन्हें अतिरिक्त राशि मंजूर हुई। बाद में जिला प्रशासन की जांच में आरोप लगाया गया कि कुछ चुनिंदा भूमि मालिकों को अधिकारियों से मिलीभगत के चलते वास्तविक बाजार मूल्य से कहीं अधिक मुआवजा दिया गया।

इसी आधार पर एफआईआर दर्ज हुई और कुछ खातों को फ्रीज किया गया। इसके बाद रेलवे प्रशासन हाईकोर्ट पहुंचा, जहां एकल न्यायाधीश ने पूरे अवॉर्ड को ही रद्द कर दिया।

अपीलकर्ता की ओर से कहा गया कि निरज जैन न तो जांच रिपोर्ट में नामित थे और न ही उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज हुआ था। इसके बावजूद उनका मुआवजा भी रद्द कर दिया गया, जो पूरी तरह अनुचित है।

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वहीं रेलवे की ओर से दलील दी गई कि संबंधित अन्य मामलों में अपीलें लंबित हैं, इसलिए इस मामले में सुनवाई टालनी चाहिए।

न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की अगुवाई वाली पीठ ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने कहा कि कुल लगभग 550 भूमि मालिकों में से केवल पांच पर ही अधिक मुआवजा पाने के आरोप हैं। अपीलकर्ता न तो उन मामलों में शामिल थे और न ही उनके खिलाफ किसी तरह की जांच या कार्रवाई हुई।

पीठ ने कहा,

“कुछ व्यक्तियों के खिलाफ आरोपों के आधार पर सभी भूमि मालिकों का मुआवजा रद्द नहीं किया जा सकता।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि रेलवे अधिनियम, 1989 के तहत न तो सक्षम प्राधिकारी और न ही मध्यस्थ को अपने ही अवॉर्ड की समीक्षा या उसे रद्द करने का अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए:

• 12 फरवरी 2018 का मूल मुआवजा अवॉर्ड बहाल किया

• जून 2019 में दिया गया बढ़ा हुआ मुआवजा भी पुनः लागू किया

अदालत ने निर्देश दिया कि शेष पूरी राशि, ब्याज और सोलैटियम सहित, तीन महीने के भीतर अपीलकर्ता को भुगतान की जाए।

इसके साथ ही अपील स्वीकार कर ली गई और सभी लंबित आवेदन निपटा दिए गए।

Case Title: Niraj Jain v. Competent Authority-cum-Additional Collector, Jagdalpur & Ors.

Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 7061 of 2025 (Registered as Civil Appeal No. ___ of 2026)

Court: Supreme Court of India

Date of Judgment: 27 January 2026

Coram: Justice Sanjay Kumar and Justice K. Vinod Chandran

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